Friday, June 29, 2018

कुछ प्रचलित देशज और हिन्दी, अपभ्रंश शब्दों का संस्कृत मूल (जो लोग देशज शब्दों में संस्कृत का मूल नहीं मानते उनका खंड़न)

hindi-ke-vikas-mein-apbhransh-ka-yog-by-namvar-singh

1) बिन्दू, बिन्दी, बूंद - बिदि अवयवे (काश्कृत्सन धातुपाठ 1.22)
2) कच्छा - कच्छ धारणे (काश्कृत्सन, 1.49)
3) गुड़ - गुड माधुर्ये (काश्कृत्सन धातु. 1.153)
4) अड्डा - अड्ड अभियोगे (काश्कृत्सन धातु. 1.157)
5) बुड्ढा - बुड्ढ उदगमने (काश्कृत्सन धातु. 1.165)
6) रण्डी - रडि व्यभिचारे (काश्कृत्सन धातु. 1.175)
7) भिड़ना - भिडि हिंसायाम (काश्कृत्सन धातु. 1.185)
8) ढूढना - ढूढिं अन्वेषणे (काश्कृत्सन 1.191)
9) अब्बा - अब्ब जनने (काश्कृत्सन धातु. 1.228) (चन्नवीर टीका , अब्बः - पिता) 
10) कील - कील बन्धे ( काश्कृत्सन 1.236)
11) तार - तृ प्लवनतरणयोः ( स्वामी दयानन्द की ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका में और काश्कृत्सन धातु. 2. 341)
12) भील - भिल भिल्ल वनप्रदेशे (काश्कृत्सन 2.500)
13) रुह - रुह जन्मनि (का.धा. 2.658)
14) मोर - मुर संवरणे (का. धा. 3.65)
15) छूरी - छुर छेदने (का.धा. 3.91) 
16 गू - गू पुरीषोत्सर्गे (का. धा. 3.107) 
ये अधिकतर देशज, अरबी, लोक प्रचलित शब्द है जिनके संस्कृत मूल यहां प्रदर्शित किये गये है)

 

संदर्भित ग्रन्थ एवं पुस्तक का नाम –

1)काश्कृत्स्यन धातुव्याख्यानम् – सम्पा. युद्धिष्ठिर मीमांसक

Wednesday, June 27, 2018

बौद्ध मत में पशु-मैथुन

- कार्तिक अय्यर




पाठकगण! बौद्ध मत में सगे,चचेरे,फूफेरे ममेरे सभी भाई-बहनों में विवाह तो चलता ही है, साथ में इनके इतिहास में पशुमैथुन तक होना मिलता है। महावंश, श्रीलंका का प्रामाणिक इतिहास माना जाता है। (कोई मूर्ख अंबेडकरवादी ये न कह दे कि ब्राह्मणों ने श्रीलंका पहुंचकर महावंश में मिलावट करदी) हम बौद्ध विद्वान भदंत आनंद कौसल्यायन जी का "महावंश हिंदी अनुवाद" का प्रमाण दे रहे हैं। सारा (वृहद) अनुवाद आपको चित्रों में मिल जायेगा। अब संक्षेप में कथा पढ़कर आनंद लीजिये:-

महावंश के षष्ठम परिच्छेद में एक कथा आती है। बंगाल का एक राजा था। उसके एक कन्या पैदा हुई, तो ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की,कि यह कन्या आगे चलकर शेर के साथ मैथुन करेगी!! ।और हुआ भी ऐसा ही। जब यह कन्या बड़ी हुई , तब यह रूपवती और काम परायणा थी।यह लड़की एक दिन घूमते-घामते जंगल में पहुंच गई ।वहां पर इसे एक शेर मिला । शेर को देखकर यह काम मोहित हो गई ।शेर इसे अपनी पीठ पर उठाकर अपनी गुफा में ले गया और इसके साथ संभोग किया। इस लड़की को गर्भ रह गया और इसने जुड़वा लड़का लड़की पैदा किए। लड़के का नाम सिंहबाहु रखा क्योंकि उसके हाथ-पैर शेर के जैसे थे और लड़की का नाम सिंहसीवली रखा।
जब सिंहबाहू16 साल का हो गया ,तब उसने अपनी मां से पूछा कि -"तुम्हारे और पिताजी के रूप में अंतर क्यों है ?"मां ने उसको सारी बात बताई ।फिर उसने निश्चय किया कि ,"हम यहां से चले जाते हैं"। गुफा पर एक बहुत बड़ा पत्थर था।उसे उठा कर के सिंह बहू 50 योजन दौड़ा और 50 योजन वापस आया।उसके बाद दोनों वहां से निकलकर एक गांव में पहुंचे, जहां पर उस राजकुमारी का मामा का लड़का रहता था।वहां पर सेनापति से उनकी भेंट हुई ।राजकुमारी ने बतलाया कि वे लोग वनवासी हैं सेनापति ने उनको वस्त्र दिए तथा पत्तों में चावल भोजन हेतु दिया। राजकुमारी के छूते ही वस्त्र बहुमूल्य वस्त्र बन गए और पत्ते सोने के पत्ते बन गए !! सेनापति विस्मित हो गया ।यह चमत्कार राजकुमारी के पुण्य प्रताप से हुआ ।इसके बाद सेनापति ने अपनी फुफेरी बहन को अपनी पत्नी बना लिया!
और आगे यह भी लिखा है कि सिंहबाहु ने लाट देश बसाया तथा सिंहसीवली को अपनी पटरानी बनाया,मतलब अपनी जुड़वा बहन से ही शादी कर ली!
फिर कहा गया है कि सिंहसीवली से 16 जुड़वा संताने हुई। यानी कुल ३२। इनमें एक 'विजय' नाम का व्यक्ति हुआ और इसने सिंहल द्वीप आ कर के बौद्ध धर्म का प्रचार किया।
( महावंश, षष्ठम परिच्छेद)
समीक्षा:-
१:- मानव स्त्री का शेर के साथ संभोग करना और उससे संतान उत्पन्न करना पूर्ण रूप से अवैज्ञानिक बात है। यह बात इतिहासविरुद्ध भी है।ऐसी मूर्खतापूर्ण गप्प का प्रचार बौद्ध ग्रंथ करते हैं
२:- 16 साल का लड़का लगभग सौ गज दूर दौड़कर एक भारी पत्थर उठाकर दौड़ता है ,यह बिल्कुल असंभव लगता है।
३:- राजकुमारी के छूने से पत्ते सोने के पत्ते बन गए ,यह एक असंभव बात है।इस प्रकार के मूर्खतापूर्ण चमत्कार बौद्ध ग्रंथों में भरे हुए हैं।इसी प्रकार से भिक्षुओं का उड़ना आदि अन्य चमत्कार बताकर अपने मत का प्रचार किया है।
४:- साथ ही यहां पर पत्तों का स्वर्णिम होने का चमत्कार राजकुमारी के पुण्य का बल कहा गया है।भला बताइए,जिस लड़की ने पशु मैथुन जैसा महापाप किया हो उसका कौन सा पुण्य?
५:- सगे भाई-बहन से उत्पन्न हुये "विजय" ने बौद्ध मत का प्रचार किया।इससे सिद्ध है कि राजकुमारी,सिंहुबाहु, विजय आदि का बौद्ध मत से सीधा संबंध है। जिनके प्रचारक राजा के ही वंश में इतनी छीछालेदर बातें हुई हैं, उनके मत का कहना ही क्या!
६:- सेनापति का फुफेरी बहन से विवाह करना और जुड़वा भाई बहनों का आपस में विवाह करना बौद्ध मत की नंगी तस्वीर दर्शाता है।यही नहीं,श्रीलंका के इस इतिहास ग्रंथ में ही एक जगह लिखा है कि श्रीलंका कि एक राजकुमारी ने अपने ममेरे लड़के से विवाह किया। इनके दशरथ जातक में राम और सीता को सहोदर भाई -बहन कहा गया है और इन कभी विवाह करा डाला!निकट संबंध में विवाह करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है और विज्ञान के विरुद्ध है और समाज में इसे अनैतिक भी माना जाता है।
भीमटे सदा ब्रह्मा पर अपनी बेटी से भोग, किंदम ऋषि से हिरणी का संभोग करना आदि आरोप लगाया करते हैं।यह सारे आरोप पूर्ण रुप से वेद विरुद्ध और मिथ्या हैं।लेकिन यह सारे आरोप इनके अपने घर से ही निकल कर इनके ऊपर हो रहे हैं ।और यह केवल बौद्ध मत के प्रमाणिक ग्रंथों को ब्राह्मणों का बनाया हुआ है ,कहकर अपना पिंड छुड़ाना चाहते हैं ।जबकि सालों से ग्रंथों को बौद्ध लोग मानते हैं,इनका उपदेश प्रचार करते हैं इसलिए इनकी प्रमाणिकता सिद्ध है।इन से जी चुराना भीमटों का पाखंड है।
।।धन्यवाद।।
( २३ जून १८)
संदर्भ ग्रंथ एवं पुस्तकें:-
महावंश- अनुवादक, भदंत आनंद कौसल्यायन

Tuesday, June 26, 2018

वेदों में पशुवध दिखाने वाले वामपंथियों की धूर्तता


अधिकतर वेदों में जो मांसाहार और यज्ञ में पशु बलि बताई जाती है, उसका आधार वामपंथी और ईसाई गुट सायणादि का भाष्य बताते है लेकिन इनके द्वारा बताऐं गयें कई मंत्र ऐसे है जिनमें सायण ने भी पशु बध का उल्लेख नहीं किया है, इससे स्पष्ट होता है कि इन्होनें जानबूझ कर सायण से विपरीत अर्थ करके वेदों से ईर्ष्या और निज स्वार्थ के कारण ऐसे आक्षेपात्मक कथनों को लिखा था। यहां हम कई वामियों और ईसाई गुटों के द्वारा किये गये अर्थों को दे रहे हैं जिनमें इन्होनें पशुवध माना है और उसी के सन्दर्भ में सायण भाष्य भी प्रस्तुत कर रहे हैं जिससे इनकी धूर्तता आप देख सकते हैं –

ऋग्वेद 10.68.3 के आधार पर विनायक महादेव आप्टे ने अतिथिनीर्गा शब्द का अर्थ अतिथि के लिए गाय मारने वाला किया है।
किन्तु यदि हम सायण भाष्य भी देखे तो उसमें ऐसा कोई उल्लेख प्राप्त नहीं होता है। सायणानुसार 10.68.3 का अर्थ होगा –
“साध्वर्याः साधूनां कल्याणानां पयसां नेत्रीः अतिथिनीः सततं गच्छन्तीः इषिराः एषणीयाः स्पर्हा स्पृहणीयाः सुवर्णाः शोभनशुक्लादिवर्णोपेताः अनवद्यरूपाः प्रशस्यरूपाः एताः गाः पर्वतेभ्यः वलसम्बन्धिभ्यः वितूर्य निर्गमय्य ऊपे देवीसमीपे निर्वपति प्रापयति यथा यवं कुसीदेभ्यः आदाय निर्वपति।”

बृहस्पति कल्याणकर जल को ले जाने वाली, निरन्तर गतिशील अभीष्ट, स्पृहणीय, सुन्दर वर्ण वाली, निर्दोषरूप वाली गौओं को वल के पर्वतों से निकालकर देवों के पास पहुँचाता है जैसे कोई ऋणदाता से लेकर जौ बोता है।

यहाँ सायण ने कहीं भी गाय मारने वाला अर्थ नहीं किया लेकिन पता नहीं इन महोदय ने सायण भाष्य की भी अवेहलना करके गौ मारना अर्थ निकाल दिया। इससे आप धूर्तता समझ सकते हैं।

अगुइलार नामक एक और धूर्त के अनुसार निम्न मंत्र “तं नो वाजा….मधत्तये” – ऋग्वेद 4.37.8 में इन्होनें समश्वं का अर्थ वध करो निकालकर घोडों का वध करों ऐसा अर्थ किया है। किन्तु सायण ने भी यहां पशुवध में प्रयुक्त न कर समश्वं का निम्न अर्थ किया है – “सभ्यगासनं कुरुत” अर्थात् प्रशंसा करों ऐसा अर्थ किया है। जब सायण ने ही इसे पशुवध में प्रयुक्त नहीं किया तो इनके द्वारा जानबूझ ऐसा अर्थ निकालना पक्षपात ही है।

एक और अन्य सी. कुन्हड राजा नें वेदों के निम्न शब्दों का अर्थ अपनी पुस्तक दि क्विटिंसेंस आँफ द ऋग्वेद पेज क्रमांक 120 में ऋग्वेद 6.1.3 का अर्थ वपा भक्षण करने वाली अग्नि किया है अर्थात् पशु चर्बी को अग्नि में पकाना। उनका कहना है कि इस मंत्र में वपावन् शब्द अग्नि के लिए आया है जिसका अर्थ है – वपा से युक्त अतः यज्ञों में मांस आहुति होती है। एक और अन्य मन्त्र जिसमें वपावन्तम् का अर्थ इन्होनें चर्बी युक्त पकाने वाला पात्र किया है। इसी प्रकार इन्होनें एक और मंत्र ऋग्वेद 8.17.8 द्वारा बताया गया है कि इसमें इन्द्र द्वारा उदर में वपा लेने का उल्लेख है। इन तीन मंत्रों के आधार पर कुन्हड़ ने यज्ञ में पशुबलि बताई है, जबकि इन मंत्रों के सायण भाष्य में भी कहीं भी सायण ने वपा का अर्थ पशु चर्बी नहीं किया है। सायण ने वपावन्तम् का अर्थ किया है – प्रवृद्धं पशुम् अर्थ किया है अर्थात् बढ़े हुए पशु या पशुओं की वृद्धि करने में अर्थ किया है न कि यज्ञ में आहुति के रुप में। दूसरे शब्दों में वपा का अर्थ वृद्धि है। वपोदरः का अर्थ भी सायण ने पीवरोदरः किया है। अर्थात् बड़े पेट वाला। यहां सायण ने भी चर्बी अर्थ नहीं किया किन्तु ये पक्षपात और ईर्ष्या के कारण चर्बी अर्थ भी ले आए।

एक अन्य स्थल पर कुन्हड़ राजा ने लिखा है कि – ऋग्वेद 10.16.4 में अग्नि से प्रार्थना की है कि वह उष्णता के अंशों में बकरे को पकावें। किन्तु सायण ने इसका निम्न अर्थ किया है –

“अजः जननरहितः शरीरेन्द्रियादिभागव्यतिरिक्तोन्तरपुरुष लक्षणों यो भागः अस्ति हे अग्ने त्वदीयने तपसा तापनेन तादृशं भागं तपस्वं तप्तं कुरु”

अर्थात् है अग्नि! इस मृत व्यक्ति का जो भाग जन्मरहित, शरीर के इन्द्रियादि भाग से भिन्न तथा जिसे अन्तर पुरुष अथवा जीवात्मा कहा जाता है उसे अपने ताप से तप्त करों।

सायण ने यहां बकरा पकाना कहीं भी नहीं लिखा बल्कि मंत्र को शव दाह में प्रयुक्त किया है किन्तु इन्होनें यहां सायण भाष्य को भी ताक में रखकर बकरा पकाना अर्थ किया।

इससे स्पष्ट है कि वामपंथी या ईसाईदगुट कोई भी लेख, खोज निष्पक्ष नहीं करते हैं बल्कि पक्षपात और अपने पूर्व में निर्धारित मानसिकता और कुंठा से करते हैं ताकि भारतीय और वैदिक संस्कृति की छवि को बिगाड़ सकें। इसके लिए देखिये यह लोग किस तरह सायण भाष्य की भी अवेहलना कर देते है और अपने अर्थ कल्पित करने लग जाते है और यदि जिन मंत्रों में सायण ने पशुवध दिखाया है उसे तो ये अपनी पुस्तकों में स्थान देते है लेकिन जिन मंत्रों में सायण ने पशुवध नहीं दिखाया और पशुवध का खंड़न किया है उसे ये लोग छिपा लेते है या फिर अपनी पुस्तकों में नहीं देते है। अतः इनका उद्देश्य वैदिक संस्कृति को नीचा दिखाना मात्र है अतःवामियों की कोई भी रिसर्च हो या पुस्तक हो उसे गटर में प्रवाहित कर देनी चाहिये।

संदर्भित ग्रन्थ एवं पुस्तकें – 

1) वैदिक वाङ्मय का विवेचन – ड़ॉ. कृष्णलाल

Thursday, June 21, 2018

डॉ. अम्बेडकर और मुस्लिम सुल्तान


आजकल के वामसेफी और स्वयं को डॉ. अम्बेडकर के अनुयायी कहलाने वाले कम्युनिस्ट भी मुस्लिम सुल्तानों की उदारवादिता और उनके शान्तिदूत होने का दिन-रात गुणगान करते हैं। टीवी सीरियलों और फिल्मों में भी इन सुल्तानों को सर्वधर्म भाव और पंथनिरपेक्ष, नेक दिखाया जाता है।
लेकिन डॉ. अम्बेडकर इन मुस्लिम सुल्तानों को इस्लामिक जिहादी मानते थे और उनका कहना था कि मुस्लिम सुल्तान भारत में इस्लामीकरण के लिए आये थे। वे हिन्दुओं के मन्दिर तोडते थे और लोगों का जबरन धर्मान्तरण भी करवाते थे। इस कथन को डॉ. अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक "पाकिस्तान अथवा भारत का विभाजन" में दिया है, उनका ये कथन अवश्य ही पठनीय है -
कासिम का जिहाद - हज्जात को भेजे एक पत्र का उल्लेख करते हुए डॉ. अम्बेड़कर लिखते हैं -
"राजा दाहिर के भतीजे, उसके योद्धाओं और प्रमुख अधिकारियों को ठिकाने लगा लिया है और मुर्तिपूजकों को या तो इस्लाम में दीक्षित कर दिया गया है अथवा उन्हें तबाह कर दिया गया है। मूर्तियों वाले मंदिरों के स्थान पर मस्जिद और अन्य इबादत स्थल बनाए गए हैं, कुतबाह पढ़ी जाती है, अजान दी जाती है ताकि निर्धारित घंटों पर इबादत होे सके। तकबीर और अल्लाह हू अकबर की सदाएं हर सेवेरे -शाम गूंजती हैं। "
गजनी के मुहम्मद के इतिहासकार अल उतबी का उल्लेख करते हुए डॉ. अम्बेडकर लिखते हैं -
"उसने मंदिरों में मुर्तियों को तोड़कर इस्लाम की स्थापना की। उसने शहरों पर कब्जा किया। नापाक कमीनों को मार डाला, मुर्तिपूजकों को तबाह किया और मुस्लिमों को गौरवान्वित किया। तदुपरान्त वह घर लौटा और इस्लाम के लिए की गई विजयों का ब्यौरा दिया और यह संकल्प व्यक्त किया कि वह हर वर्ग के खिलाफ जिहाद करेगा।
मुहम्मद गौरी के विषय में हसन निजामी का कथन रखते हुए ड़़ा. अम्बेडकर लिखते हैं -
"उन्होनें अपनी तलवार से हिंद को कुफ्र की गंदगी से साफ किया और पाप से मुक्त किया तथा उस सारे मुल्क को बहुदेववाद के कंटक से स्वच्छ किया, मुर्तिपूजा की अपवित्रता से पाक किया और शाही शौर्य और साहस का प्रदर्शन करते हुए एक भी मंदिर खडा़ नहीं रहने दिया।"
- पाकिस्तान अथवा भारत का विभाजन, एकता का विघटन, पृष्ठ 69-70
इसी में डॉ. अम्बेडकर नें विभिन्न मुस्लिम सुल्तानों के आपसी युद्धों का भी वर्णन करते हुए लिखा है कि ये सभी आक्रांता एक बात पर आपस में एक थे वो था - "हिन्दू धर्म का विध्वंस" - पाकिस्तान अथवा भारत का विभाजन, पृष्ठ 70.
इसी पुस्तक में डॉ. अम्बेडकर जी ने बख्तियार खिलजी और कुतुबुद्दीन ऐबक का भी उल्लेख किया है जिसमें ऐबक के द्वारा 1000 मंदिरों को विध्वंस करने का उल्लेख ड़ॉ अम्बेडकर द्वारा किया गया है।
इन सभी वर्णनों से यह निष्कर्ष निकलता है कि -
1) ड़़ा. अम्बेडकर जी के अनुसार मुस्लिम आक्रमणकारी जिहादी थे।
2) हिन्दुओं के अनेकों मन्दिर मुस्लिम सुल्तानों ने नष्ट किये थे।
3) मुस्लिम सुल्तान धर्मनिरपेक्ष और शान्ति के पक्ष में नहीं थे बल्कि उनका उद्देश्य भारत में इस्लाम फैलाना और जो मुस्लिम न बनें उसका नाश करना था।
इन सब प्रमाणों से स्पष्ट है कि स्वयं को अम्बेडकर भक्त बोलने वाले और मुस्लिम सुल्तानों की उदारता का गुणगान करने वाले कम्युनिस्ट दोगले वर्णसंकर होते है, उनके षडयंत्र और झूठ से सभी को बचना चाहिए।
संदर्भित पुस्तक एवं ग्रन्थ - 
1) पाकिस्तान अथवा भारत का विभाजन - डॉ. अम्बेड़कर

Tuesday, June 19, 2018

सिंधुघाटी के शिलाचित्र के हाथी का रहस्य



- कार्तिक अय्यर
।।ओ३म्।।
हमारे मित्र अग्रजश्री नटराज नचिकेता जी ने सिंधुघाटी के एक शिलालेख पर एक लेख लिखा था। उसमें एक चक्र था व एक आदमी दो कुत्तों को,जो विपरीत मुख किये थे, पकड़े हुये था। नटराज जी ने चक्र से कालचक्र को संवत्सर काल चक्र, दो कुत्तों को दिन और रात का परिचायक, व छह अरे छह ऋतुयें- ऐसा अर्थ बताया। कई मित्र शिलालेख में हाथी का अर्थ कर कर रहे थे । दरअसल उस हाथी का भी वैदिकधर्म से संबंध हो सकता है। अथर्ववेद में भी हस्तिवर्चस का वर्णन आता है:-
हस्तिवर्चसं प्रथतां बृहद्यशो अदित्या यत्तन्वः संबभूव ।
तत्सर्वे समदुर्मह्यमेतद्विश्वे देवा अदितिः सजोषाः ॥१॥
येन हस्ती वर्चसा संबभूव येन राजा मनुष्येस्वप्स्वन्तः ।।३।।
हस्ती मृगाणां सुषदामतिष्ठावान् बभूव हि ।
तस्य भगेन वर्चसाभि षिञ्चामि मामहम् ॥६॥
( अथर्ववेद, कांड ३, सूक्त २२ पं विश्वनाथ विद्यालंकारकृत भाष्य)
हाथी के तेज जैसा तेज राष्ट्र में फैले, यह तेज महायशरूप है,जो तेज अदित्या अर्थात् न क्षीण होनेवाली प्रकृति से उत्पन्न है। हस्तिवर्चस है महाबलरूपी तेज।।१।।
जिस वर्चस् के साथ हाथी पैदा हुआ है, वह वर्चस् अग्निरूप प्रधानमंत्री को प्राप्त हो। हस्ती का वर्चस् है, उसका तेज,शारीरिक बल।।३।।
मृगों(जंगली जानवरों) के मध्य हाथी निश्चय से बल में सबको अतिक्रांत करके स्थित हुआ है; उस हाथी के तेज द्वारा मैं अपने आपका अभिषेक करता हूं।।६।।
( ये अर्थ हमने पंडिजी की के ही शब्दों में संक्षिप्त कर दिया है।)
यहां इस सूक्त में हाथी जैसे बल की प्रार्थना की गई है। अतः हाथी का संबंध वेद से है। हां, हाथी का अर्थ भीमटो से भी हो सकता है। वो कैसे? देखिये:-
(१):- ये "हाथी" वो सफेद हाथी है जो महामाया के ...... में घुसा, और बाद में बुद्ध जी का जन्म हुआ। बुद्ध जी को हम हाथीपुत्र भी कह सकते हैं, क्योंकि हाथी के कारण उनका जन्म है।
(२):- या फिर ये सुत्तपिटक विमानवत्थु का सफेद हाथी है, जिस पर बौद्धों के मूलनिवासी इंद्रदेवता सवार होकर हवा में नाचते हैं! 😁😁
(३):- या फिर ये मायावती की पार्टी का हाथी है। मुझे बीएसपी का एक और नारा याद आता है-"ब्राह्मण शंख बजायेगा। हाथी चलता जायेगा।।"
खैर, हमने केवल तथ्य रखे हैं, बाकी पाठकों पर निर्णय छोड़ते हैं।
संदर्भ ग्रंथ एवं पुस्तकें:-
अथर्ववेद- पं विश्वनाथ विद्यालंकारकृत भाष्य।
।।धन्यवाद।।
।।ओ३म्।।

Saturday, June 16, 2018

हडप्पा की एक अन्य शील में वैदिक सिद्धान्त


इस चित्र के ऊपर का भाग दिखा कर कुछ नवबौद्ध कहते है कि इसमें दिखाया गया चक्र धम्म चक्र है और ये बौद्ध मत से सम्बन्धित है। अब देखिये इनकी इस बात का हम पहले भी खंड़न कर चुके हैं और अब भी करते है।
आप जब इस चित्र को देखेंगे तो इसमें धम्म चक्र के नीचे ही एक व्यक्ति दो पशुओं के साथ हिंसा कर रहा है अर्थात् उनकी गर्दन पकड़े है। अब कौई भीमटा मुझे बतावें कि ये कैसा धम्म चक्क है जिसके नीचे ऐसे हिंसा की जाती हो? क्या ये माना जावे कि बोद्ध धम्म आने से या धम्म चक्क आने से लोग जानवरों की गर्दन पकड़ कर उठा लेते थे?
वास्तव में ये भीमटे कहीं भी हों पूरा प्रकरण नहीं देखते हैं सिर्फ अपने मतलब का देखते हैं और छाप देते है।
अब इस शील का रहस्य क्या है? इसमें दिये चित्रों का अर्थ क्या है? इसे हम केवल वैदिक ग्रन्थों और रामायण महाभारत आदि से जान सकते हैं।
सर्वप्रथम इस चित्र में चक्र को देंखे। इस चक्र में 6 आरे हैं। ये 6 आरें वास्तव में 6 ऋतुएँ है । वेदों और शास्त्रों में 6 ऋतुओं का उल्लेख हुआ है और इन 6 ऋतुओं का एक चक्र बनता है जो लगातार चलता है। अतः ये धम्म चक्र नहीं बल्कि कालचक्र है।
अब इसकी पुष्टि के लिए आगे और देखिये। नीचे एक व्यक्ति है उसके दोनों हाथों में दो जानवर हैं और व्यक्ति का सिर गोल है और उसके सिर पर कई कांटेदार संरचना है। यह व्यक्ति और दो जानवरों का सम्बन्ध भी उपर वाले चक्र से है, इसलिए इन्हें शिल्पकार नें एक साथ बनाया है। वास्तव में ये दो जानवर कोई और नहीं बल्कि दोे कुत्ते है। इनका वर्णन अथर्ववेद 18.2.12 में आया है - "श्वानों ते रक्षितारौ" - अथर्व.18.2.12 इस मंत्र में देवता यम अर्थात् काल है। यमः का एक अर्थ शब्दकल्पद्रुम में काल लिखा है। अर्थात् ये दो जानवर कोई अन्य नहीं बल्कि यम के दो कुत्ते शबल और श्याम हैं। इन पर शांखायन ब्राह्मण में लिखा है -
" हर्वे शबलो रात्रि: श्याम: " - शा.ब्रा. २/२
अर्थात् जो शबल है वो दिन है और जो श्याम है वो रात्रि है |
अतः ये कुत्ते दिन और रात का रुपक है।
अब जो मध्य में जो पुरुष है जो कुत्तों को पकड़े हुए है वो वास्तव में सूर्य का रुपक हैं क्योंकि वह गोल आकृति का है। द्वितीय उसके गोल चहरे के चारों तरफ जो कांटे है वो सूर्य की किरणों का चित्रण मात्र है। अतः
चक्र - काल चक्र
चक्र के आरे - छः ऋतुऐं
पुरुष - सूर्य
दो कुत्ते - दिन और रात
अतः ये सम्पूर्ण चित्र हमें काल के बारें में वैदिक सिद्धान्त समझा रहा है। वेदों में दिन रात को यम के दो कुत्ते कहा है। अर्थात् इस काल के दिन और रात दो कुत्तों जैसे है जो कि काल के आने और निकलने की सूचना देते है। तथा ये दिन और रात का कारण हम जानते है कि सूर्य ही है। अर्थात् मानों की सूर्य ने इनकी गर्दन इस तरह पकड़ रखी है कि ये उससे बच नहीं सकते है। अर्थात् ये सूर्य के हाथों ही नाचते है। यहां दो कुत्ते और पुरुष द्वारा दिन रात बनना बताया है। दोनों कुत्ते विपरीत दिशा में है जो ये बताता है कि जहां दिन होता है उसके दूसरी तरफ रात होती है। तथा यहीं सूर्य ऋतुओं का भी निर्माता है या इसी काल में दिन रात के अलावा 6 ऋतुएं भी आती है उसी का संकेत ऊपर चक्र में बताया है।
इस तरह ये पूरा शिल्प किसी बोद्ध संस्कृति को नहीं बताता बल्कि समय की ऋतु और दिन रात के रुप में कालचक्र और काल के वैदिक सिद्धान्त को बताता है।
( अरुण जी सर की टिप्पणी - सूर्य द्वारा नियंत्रित दिन रात और ऋतुओं का क्रम धरा पर जंतुओं के रहने और भोजन की व्यवस्था करता है। हाथी शाकाहारी है और उसका भोजन भी वनस्पति है। बिना सूर्य के वनस्पति का होना संभव नहीं। शायद हाथी की चित्र में सबसे नीचे उपस्थिति यही दर्शाती हो।)

संदर्भित पुस्तक और ग्रन्थ का नाम - 
1) अथर्ववेद - अनु. क्षेमकरणदास त्रिवेदी
2) शांखायन ब्राह्मण - अनु. गंगसहाय
3) शब्द कल्पद्रुम - मोबाइल एप

Thursday, June 14, 2018

लक्ष्मण रेखा के संदर्भ में भ्रान्ति फैला रहे वामपंथियों का खंड़न


दो जुडवा भाई है। उन्होनें एक विकट गालियों से युक्त एक वास्तविक कार्यक्रम बनाया था जिसका नाम है - रोडीज.. इनकी विचारधारा कम्युनिस्ट और फेमिनिस्ट जैसी है। इनमें से एक भाई रघु राम है। इन्होनें एक और नये कार्यक्रम जिसका नाम है, हो जा रिजेन्डर, कुछ इस प्रकार से है में किसी हिन्दू सेना वाले को फटकार लगाई थी। उसका विडियों आप नीचे देखेंगे। इस विडियों में रघुराम नें रामायण कालीन आर्यों पर आक्षेप करते हुए कहा कि लक्ष्मण जी सीताजी के लिए एक लक्ष्मण रेखा खींचकर गए थे, वास्तव में ये लक्ष्मण रेखा उस समय औरत पर बंदिश थी। इस लक्ष्मण रेखा के नाम से रघु ये बताना चाह रहे थे कि राम और लक्ष्मण ने सीता पर पाबन्धी लगाई थी। हमारे महापुरुषों नें वैदिक काल में स्त्रियों पर इधर-उधर जाने और स्वतंत्रता से रहने पर रोक लगाई थी। यही लक्ष्मण द्वारा सीता के लिए लक्ष्मण रेखा है। इसी पर अब एक टीवी शो भी बन रहा है जो शायद अब प्रसारित हो चुका है जिसका नाम है मिटेगी लक्ष्मण रेखा.. इस सीरियल में भी लक्ष्मण रेखा के नाम से ऐसा ही निशाना महापुरुषों और प्राचीन भारतीय संस्कृति पर साधा गया है। 
अब हम इन सभी बातों की समीक्षा करते हैं - 
प्रथम तो बाल्मीकि रामायण में लक्ष्मण रेखा का कोई उल्लेख नहीं है इसलिए रघु द्वारा बोली गई वह बात मूल में ही अभावभाव को होने से सत्य नहीं है अर्थात् इसमें रघु द्वारा लक्ष्मण रेखा की बात कहना ही गलत है। इसी के साथ प्रथम दृष्टि में लगाया दोषारोपण ही गलत सिद्ध हो जाता है। 
अब कोई यह कहे कि लक्ष्मण ने सीता को कुटी के अन्दर ही रहने को कहा था, और बाहर आने को नहीं।
तो इसका उत्तर भी सुने ... परिवार में आपस में एक-दूसरे की सुरक्षा का एक दूसरे के प्रति दायित्व होता है। लोक में भी हम देखते है कि माता पिता जब बच्चों के साथ किसी अनजान जगह जाते है और उन्हें बच्चों को छो़ड़कर कुछ लेने जाना हो तो वे भी बच्चों से कहते है कि यहां से कहीं भी मत जाना, यहीं मिलना आदि तो क्या इसका अर्थ यह लिया जा सकता है कि माता-पिता बच्चों को परतंत्र कर रहे हैॆ? इसका उत्तर होगा कदापि नहीं बल्कि वे तो ऐसा इसलिए कह रहे हैं कि बच्चे अनजान जगह में खो न जावें। इसी तरह एक और उदाहरण लिजीए। कुछ मित्र किसी जंगल में भ्रमण के लिए जाते हैं और अब जंगल के बीचों बीच उन्हें प्यास लगती है तो कुछ मित्र जल लाने के लिए जाते है तो जो जल लेने जा रहे हैं वे मित्र अपने उन मित्रों से जो जल लेने उनकें साथ नहीं जा रहे हैं से कहते हैं कि तुम लोग यहां से कहीं भी मत जाना और अपना ध्यान रखना, हम जल ले कर यहीं पर मिलेंगे। अब क्या इसमें ये माना जा सकता है कि मित्रों ने मित्रों को परतंत्र कर लिया? इसका भी उत्तर बिल्कुल भी नहीं होगा। 
इसी प्रकार सीता जी को लक्ष्मण जी द्वारा कुटिया में इसीलिए रूकने को कहा गया कि उस समय प्रथम तो राम जी द्वारा कई राक्षसों का वैर हो गया था क्योंकि श्री राम ने राक्षसों का वध विश्वामित्र के साथ कर दिया था। ऐसे में ये भय तो होता ही था कि कभी भी कोई भी राक्षस किसी भी तरह हमला न कर देंवे। अतः लक्ष्मण जी ने सीता को परतंत्र करने के उद्देश्य से नहीं बल्कि सुरक्षा की दृष्टि से ऐसा कहा और सुरक्षा और परतंत्रता में अंतर होता है। आश्चर्य नहीं कल को आप सीमा सुरक्षा बलों द्वारा हमारी सुरक्षा को और हमें बार्डर पार करने से रोकने को आप परतंत्रता, शोषणादि नाम न दे देंवे। 
श्री राम पर राक्षसों का खतरा रहता था। यह बात लक्ष्मण जी ने सीता जी से कही है - 
देखें अरण्यकांडं में - 
कृतवैराश्च कल्याणि वयमेतैर्निशाचरैः। खरस्य निधने देवि जनस्थानंवधं प्रति।। 
अर्थात् हे देवि! खर और जनस्थान का वध करके हमने इन राक्षसों से वैर उत्पन्न कर लिया है। 
इस वाक्य से कोई भी समझ सकता है कि श्रीराम के परिवार को आपस में कितना सतर्क रहना होता होगा। पता नहीं कब कौन राक्षस कैसे किस पर हमला कर देवे या हानि पहुचा देंवे। इसी कारण लक्ष्मण ने सुरक्षा की दृष्टि से ऐसा किया तथा राम जी भी लक्ष्मण को सीता के समीप इसी सुरक्षा के भाव से ही छोड़कर गए थे। 
आप स्वंय देखें कि जब आप अपने रोडीज कार्यक्रम में कुछ लडकें और लडकियों को कहीं बाहर ले जाते थे तब क्या आप उनकी सुरक्षा का उचित प्रबन्ध नहीं करते थे? आप उनकी सुरक्षा के प्रबंध अवश्य ही करते होंगे जबकि वे लड़के और लड़कियाँ स्वयं भी सक्षम है लेकिन फिर भी आप उन्हें अपनी जिम्मेदारी होने से सुरक्षा देते होंगे। इसे कोई भी परतंत्रता नहीं कहता है क्योंकि ये एक-दूसरे के प्रति एक दूसरे का दायित्व और कर्तव्य बताता है और हमारी संस्कृति कर्तव्य और दायित्व प्रधान है। 
अब कोई यह कहे कि उस काल में स्त्रियों को बोलने नहीं दिया जाता था। शोषण किया जाता था और पुरुषों के समक्ष वो अपनी बात नहीं रख सकती थी।
इस पर आप स्वयं रामायण देखें तो प्रक्षिप्त स्थलों को छोड़ने पर स्त्रियों की उचित स्वतंत्रता रामायण में दिखाई देती है। प्रथम कैकई ही देखे जिसने राजा दशरथ के साथ युद्ध क्षेत्र में भाग लिया था तथा इसने अपना रौब भी राजा दशरथ तक को दिखाया था इस बात से सभी परिचित हैं। इसी में कोशल्या माता का राम जी को उपदेश करना भी प्राप्त होता है जिससे कि स्त्रियों को पुरुषों के समक्ष बोलने का आजादी नहीं थी इस बात का खंड़न हो जाता है। 
अब कोई यह कहे कि पत्नि को पति के समक्ष बोलने की अनुमति नहीं थी तो ये बात भी गलत है यदि पूर्वाग्रह त्याग कर रामायण पढ़ें तो स्वयं सीता जी नें अरण्यकांड़ में श्री राम जी को बड़े ही आदर और मर्यादा पूर्वक धर्मोपदेश किया था या कहें कि उनकें समक्ष अपनी बात और अपना पक्ष भी रखा था। उनमें से माता सीताजी के एक उपदेश जो श्री राम के प्रति किया गया था, का एक श्लोक देतें हैं- 
सीताजी द्वारा ये उपदेश/पक्ष तीन दोेषों के ऊपर रखे गये थे - 
सीता जी कहती हैं - 
त्रीण्येव व्यसनान्यत्र कामजानि भवन्त्युत। 
मिथ्यावाक्यं परमकं तस्माद गुरुतरावुभौ।
परदाराभिगमनं विना वैरं च रौद्रता।।
अर्थात् कामज व्यसन तीन प्रकार के माने गये हैं। उनमें मिथ्या भाषण करना भयंकर पाप है तथा शेष दो पर-स्त्रीगमन और अकारण प्राणियों की हिंसा उससे भी बढ़कर है। 
इससे समझा जा सकता है कि स्त्रियों को भी उस समय अधिकार थे। हाँ आपकी जैसी सोचवाली स्वतंत्रता अवश्य नहीं थी जैसे कि विवाह से पहले संबंध बनाना, शराब पीना और गालियों वाली भाषा बोलना और यह मर्यादा पुरुषों के लिए भी थी। 
https://www.youtube.com/watch?v=85erhAit87c&t=3s

संदर्भित ग्रन्थ एवं पुस्तकें - 
1) वाल्मीकि रामायण - अनु. आर्यमुनि जी 
2) वाल्मीकि रामायण - अनु. जगदीश्वरानन्द सरस्वती जी