Sunday, February 3, 2019

नास्तिक कुतर्कों शमन -2

शङ्का - यदि ईश्वर का अस्तित्व होता तो चक्षु इन्द्रिय से अवश्य ग्रहण किया जाता। परन्तु आज तक किसी व्यक्ति ने ईश्वर का प्रत्यक्ष नहीं किया, लोग शशश्रृंग अर्थात् शश के सींग या भूत - प्रेत, जिन्द - फरिश्ता, परी - एंजल तो कहते हैं परन्तु शब्दमात्र से भिन्न शशश्रृंग, भूत - प्रेत, जिन्द - फरिश्ता, परी - एंजल का कोई अस्तित्व नहीं है, इसी प्रकार ईश्वर ईश्वर तो लोग कहते हैं परन्तु शब्दमात्र से संसार में कहीं भी ईश्वर का अस्तित्व नहीं है - अतः ईश्वर को मानने में प्रत्यक्ष प्रमाण बाधक है। 
समाधान - न्याय कुसुमाञ्जलिकार अपने ग्रन्थ के तृतीयः स्तवकः में कहते हैं - 
"योग्या दृष्टिः कुतोयोग्ये प्रतिबन्धिः कुतस्तराम्
क्वायोग्यं बाध्यते श्रृंङ्गं क्वानुमानमनाश्रयम्।।"
अर्थात् अभाव के सर्वथा अयोग्य ईश्वर के विषय में योग्य की अनुपलब्धि किस प्रकार से बाधित हो सकती हैं? ईश्वर की सत्तासिद्धि के मार्ग में बाधा पहुंचाने वाला कहां से हो गया? परमेश्वर की सत्ता को, शशशृंग का दृष्टान्त किस प्रकार बाधा पहुँचा सकता है? आश्रय रहित, अनुमान, कहाँ पक्ष साधक हो सकता है? 
इस कारिका में कारिकाकार कहना चाहते है कि संसार में दो प्रकार की अनुपलब्धियां हैं। एक योग्यानुपलब्धि दूसरी अयोग्यानुपलब्धि, जिन वस्तुओं का अस्तित्व नहीं है और नाम कल्पना कर लिये गये हैं उनका कहीं भी न पाया जाना योग्यानुपलब्धि है - जैसे खरगोश के सींग, जिन्द - फरिश्ते, भूत - प्रेत, परी - अपसरा - फरिश्ते, वन्ध्यापुत्र आदि तथा जिन पदार्थों की प्रतीति किसी कारणवशात् नहीं होती, अथवा चक्षु से दिखाई नहीं देते, उनका उस समय न पाया जाना अथवा चक्षु आदि इन्द्रिय से ग्रहण के सर्वथा अयोग्य होना अयोग्यानुपलब्धि कहलाती है। जैसे - एटम, ध्वनि तरंगे, परमाणु, मन, चुम्बकीय तरंगे इत्यादि। इन दोनों प्रकार की अनुपलब्धियों को एक मान लेना और आँख से न दिखाई देने वाली योग्य वस्तु आदि पदार्थों को शशशृंग आदि के समान असम्भव मान लेना बड़ी भयंकर भूल है। अतः ऐसे उदाहरण या दृष्टान्त ईश्वर की असिद्धि में किसी भी प्रकार से सहायक नहीं हो सकते हैं।
संदर्भित ग्रंथ एवं पुस्तकें - 
1) न्यायकुसुमाञ्जलि - आचार्य उदयनाचार्य जी 

क्या मनुस्मृति में स्त्री को धन रखने का अधिकार नही है?


ओ3म्।।
विधर्मियों द्वारा मनुस्मृति के निम्न श्लोक को लक्षित करके पृथ्वी के प्रथम सम्राट भगवान मनु को स्त्री विरोधी सिद्ध करने की कुचेष्टा की जा रही है।
श्लोक का भावार्थ आक्षेपकर्त्ता निम्न प्रकार प्रस्तुत करते हैं -
संपति और मिलकियत के अधिकार और दावो के लिए, शूद्र की स्त्रिया भी "दास" हैं, स्त्री को संपति रखने का अधिकार नही हैं, स्त्री की संपति का मलिक उसका पति,पूत्र, या पिता हैं. - मनुस्मुर्तिःअध्याय-8 श्लोक-४१६

समाधान - उपरोक्त श्लोक का मूलपाठ निम्न प्रकार है - 
"भार्या पुत्रश्च दासश्च त्रय एवाधनाः स्मृताः। यत्ते समधिगच्छन्ति यस्य ते तद्धनम्।।" - मनु 8.416
इस श्लोक का अर्थ है - पत्नि, पुत्र, दास ये तीनों निर्धन कहे गये हैं। क्योंकि ये तीनों जो कमाते हैं वो उसको प्राप्त होता है जिसके ये है। 
यहाँ ध्यान देना आवश्यक है किसी भी श्लोक के वाक्यार्थ बोध के लिए चार कारणों को अवश्य ही विचार करना चाहिये। ये चार कारण है - आकाङ्क्षा, योग्यता, आसक्ति, तात्पर्य। इन के बोध के बिना वक्ता के अभिप्राय का ग्रहण करना सम्भव नही है। उसी प्रकार उपरोक्त श्लोक का तात्पर्य यह नही है कि स्त्री से धन छीन लिया जाये या उसे धन ना दिया जाये। जबकि सम्पत्ति में कई जगह पुत्री का भी अधिकार मनु महाराज ने माना है - 
 यथेवात्मा तथा पुत्र: पुत्रेण दुहिता समा | तम्यामात्मनि तिष्ठन्त्या कथमन्यो धन हरेत || मनु ९/१३०
जैसे अपनी आत्मा है वैसे ही पुत्र है और जैसे पुत्र है वैसे ही पुत्री है अर्थात पुत्र पुत्री समान है इस आत्मारूप पुत्री के होते हुए दूसरा धन कैसे ले जा सकता है ,अत: पुत्र के साथ पुत्री भी धन की अधिकारी है |
अतः विधर्मियों द्वारा निर्देशित श्लोक का जो भावार्थ प्रकट किया जा रहा है, वो सर्वथा अशुद्ध है। इस श्लोक का वास्तविक भावार्थ किसी को सम्पत्ति के अनाधिकार में नही है अपितु भावनात्मक रुप में अपने कमाये हुए धन को घर के स्वामी को सौंपने में है। जिससे उस धन को घर का स्वामी उचित कार्यों और परिवार के पालन - पोषण में व्यय कर सके। इस श्लोक के आधार पर निम्न बातें आश्रेपकर्त्ताओं को अवश्य विचार करनी चाहिये - 
1 इस श्लोक में पत्नि के अलावा पुत्र और दास का भी कथन है तो क्या इस आधार पर मनुस्मृति को पुत्र विरोधी भी मान लोगे या पुरुष विरोधी भी? 
2 क्या आपके घर में आपके बेटे जो धन कमाते हैं, उसे घर खर्च के लिए आपको नही देते हैं। यदि देते हैं तो क्या इससे आप उनका सम्पत्ति से अनाधिकार कर देते हैं? 
इन दो कथनों पर विचार करने से स्पष्ट हो जाता है कि जैसे पुत्र अपने कमाये हुए धन को अपने पिता को देता है, जिससे धन का परिवार के लिए ही उपयोग हो सके, उसी प्रकार घर की स्त्री को भी अपने कमाये हुए धन को अपने पति या घर के स्वामी को देना चाहिये। इस श्लोक में केवल पत्नि की ही बात नही है अपितु पुत्र और नौकर की भी बात है, जिसे आक्षेपकर्त्ता ने अर्थ करते हुए बडी ही सावधानी से छिपा लिया था। इसलिए इस श्लोक के आधार पर केवल स्त्री विरोधी सिद्ध करना किसी भी प्रकार से सम्भव प्रतीत नही होता है। 
अतः निष्कर्ष निकलता है कि श्लोक के द्वारा मनु ने स्त्री को धन या सम्पत्ति में अनाधिकारी नही बताया है, अपितु कमाये हुए धन को स्वेच्छापूर्वक अपने स्वामी को देने की बात कही है। पत्नि ही नही पुत्र और भृत्य को भी धन स्वामी को स्वेच्छापूर्वक देने की बात है। इसमें इन तीनों का शोषण नही अपितु लाभ ही है। इससे धन का उचित और परिवार के ही पालन - पोषण में व्यय होगा। स्त्री, बालक और नौकर के धन की सुरक्षा रहेगी अन्यथा इनको शरीर और बुद्धि से निर्बल जानकर कोई भी बलात् या बहका कर धन का हरण कर सकता है। जैसे हम अपना धन बैंकों को दे देते है या राष्ट्र निर्माण के लिए अपने धन में से कुछ धन कर के रुप में सरकार को देते हैं उसी तरह यहाँ भी ये श्लोक परिवार के पालन और धन की सुरक्षा को ध्यान में रखकर ही विधान किया गया है। 
संदर्भित ग्रंथ एवं पुस्तकें - 
1) मानवधर्मशास्त्र - मुम्बई से प्रकाशित 6 टीकाकारों और लगभग 30 संस्करणों से संगृहीत अतिदुर्लभ संस्करण 

Saturday, February 2, 2019

नास्तिक कुतर्कों शमन


ओ3म्।।
प्रायः ईश्वर के अस्तित्व को न मानने वाले और स्वयं को ही ब्रह्माण्ड में एक मात्र तार्किक मानने वाले कुछ नास्तिक जन ईश्वर असिद्धि के लिए निम्न तर्क प्रस्तुत करते हैं -
यदि ईश्वर है तो इस पत्थर को पानी बना दे।
यदि ईश्वर है तो मेरी लम्बाई 5 फिट से 6 फिट कर दे। यदि ईश्वर ये नही कर सकता तो हम उसको नही मानते है।
समाधान - नास्तिक द्वारा इस प्रकार दिये गये सभी हैतु अयुक्त हैं, क्योंकि प्रथम तो ईश्वर किसी व्यक्ति विशेष का भृत्य नही है, जो किसी के अविवेकपूर्ण आदेश का पालन करे। इस प्रकार के तर्कों से किसी का अस्तित्व और अनास्तित्व सिद्ध करना सम्भव नही है। उदाहरण के लिए यदि मैं किसी इंजीनियर से कहूँ कि यदि आप इंजीनियर हैं तो मेरे घर के टीवी को पंखा बनाकर बतायें। यदि नही बना सकते तो मैं आपका अस्तित्व नकारता हूँ, तो ऐसी बातो से अमूक व्यक्ति इंजीनियर है या नहीं है, इसकी परीक्षा नही हो सकती है। उसी प्रकार इस प्रकार के विवेकहीन तर्कों से ईश्वरासिद्धि नही हो सकती है। दूसरा ईश्वर जो रचना करता है वो पूर्व से ही निश्चयात्मक होती है, जिस पत्थर को आप पानी बनाने को कह रहे हैं, उसे यदि ईश्वर द्वारा जल बनाना ही होता तो ईश्वर उसे पत्थर बनाने से पूर्व जल के रुप में ही बनाता क्योंकि ईश्वर द्वारा जल और पत्थर दोनो की सृष्टि की जा चुकी है और पर्याप्त मात्रा में की जा चुकी है अतः पुनः आपके द्वारा निर्देशित पाषाण को जल बनाने की आवश्यकता ईश्वर को नही है तथा निष्प्रयोजित कोई भी कार्य ईश्वर द्वारा नही किया जाता है।
आपका दूसरा तर्क भी इसी प्रकार तर्कहीन है क्योंकि आपके शरीर की अवस्था के कारण आप स्वयं ही है, चाहे आपका ये शरीर आपके पूर्व जन्मों के फलस्वरुप हो या इस जन्म में आपके स्वयं की कुछ गलतियों के कारण हो, अतः आपके शरीर में परिवर्तन के लिए ईश्वर बाध्य नही है। ईश्वर को जैसा उचित होगा ईश्वर वैसा करेगा उसे किसी के निर्देश की आवश्यकता नही है।
एक अन्य तर्क - ईश्वर किसी के अधीन नही है यदि ईश्वर किसी के भी आदेश का पालन करने लग जाये तो वो परतंत्र होने से सर्वशक्तिमान नही रहेगा तथा सर्वशक्तिमान और पराधीन होने से ईश्वर नही रहेगा अतः स्वभावतः स्वतंत्र और किसी के अधीनस्त न होने के कारण ईश्वर किसी भी नास्तिक के आदेश का मात्र, अपनी सिद्धि के लिए पालन करने के लिए अबाध्य है।
अतः इन दोनों हैतु से ईश्वर की असिद्धि किसी भी प्रकार से सम्भव नही है, साथ ही दोनों हैतु को लेकर न्याय शास्त्र की पंचावयव प्रक्रिया द्वारा ईश्वर की असिद्धि सम्भव नही है। इसलिए ये हैतु हैत्वाभास ही है। 

Thursday, January 31, 2019

क्यों वधू का ही वर के गृह आना उचित है?


वैदिक धर्म में नारी का एक सम्मान पूर्ण स्थान है। भगवान मनु की नारी के प्रति कारुणिक दृष्टि पर एक पोस्ट हम इसी ब्लाँग में पूर्व में दे चुके हैं। जिसे निम्न लिंक से पढा जा सकता है -
https://nastikwadkhandan.blogspot.com/2017/07/blog-post.html
वैदिक धर्म के उधार दृष्टिकोण से अनावगत कई बंधु, आधुनिक छद्म नारीवादियों के बहकावे में आ कर, ये शंका करते हैं कि यदि वैदिक धर्म में नारी परतंत्र नही है तो क्यों वधू ही वर के घर आती है? वर वधू के घर क्यों नही जाता है? इस प्रकार की शङ्काओं के चलते, वे वैदिक धर्म को इन छद्म नारीवादियों के समान पुरुषवादी मात्र ही मान लेते हैं जबकि वास्तव में यह धर्म न तो पुरुषवादी है न ही नारीवाद प्रधान है अपितु दोनों के ही लिए कल्याणकारी होने से तथा मनुष्यों के साथ - साथ अन्य प्राणियों के भी हित में होने से मानवतावादी है।
इस धर्म में प्रत्येक संस्कार हमारे पूर्वजों की दूरदृष्टि के द्योतक है। वधु का वर के घर आने के पीछे निम्न सिद्धान्त कार्यान्वित होता है कि स्त्री और पुरुषों में पुरुष प्राकृतिक रुप से अधिक बलिष्ठ होता है। एक दो अपवाद को छोड दे तो प्रायः करके पुरुष ही अधिक बलिष्ठ होते हैं। सूक्ष्म रुप से पुरुषों में वाई गुणसूत्र और टेस्टोस्टेराँन आदि हार्मोनों के कारण उनमें ये विशेषता प्राप्त होती है जबकि महिलाओं में विशेषकर एस्ट्रोजन हार्मोन अधिक होता है तथा टेस्टोस्टेराँन कम होता है, इस कारण वे पुरुषों से अधिक व्यवहार प्रधान, सहनशील और भावनात्मक होती है। 
अतः भावप्रधान होने से, शरीर से कोमलांग तथा अपेक्षाकृत निर्बल संरचना होने के कारण स्त्री को सदा पुरुषों के संरक्षण में रहने का विधान किया गया है। मनुस्मृति में भगवान मनु ने कुछ इस तरह श्लोकों द्वारा ये बात कही है -
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवनेरक्षन्ति स्थाविरे पुत्रा ,न स्त्री स्वातन्त्रयमर्हति  || मनु ९/३ 
बाल्यावस्था में पिता ,यौवन में पति ,बुढापे में पुत्र स्त्री की रक्षा करे , स्त्री को कभी स्वतंत्र न छोड़े अर्थात सदा स्त्री की रक्षा करे उसे अकेले न ऐसे न छोड़े की रक्षा करना कठिन हो या अपनी पूरी देखरेख मे रखे।
यहाँ इस श्लोक परतंत्र करने का अर्थ यह नही है कि उन्हें गुलाम बना लिया जाये बल्कि उनको संरक्षण प्रधान करना है जैसे माता पिता अपने बालक का करते हैं, क्योंकि बालक अपेक्षाकृत निर्बल और कोमल होते हैं। (इस विषय में अधिक उपरोक्त लिंक में पढ सकते हैं) 
जब स्त्री बाल्यावस्था में होती है तब उसके पिता और उसके भाई उसे संरक्षण देने में सक्षम होते हैं किन्तु जब स्त्री तरुण और युवा होती है तब पिता के वृद्धावस्था में आने से तथा भाई का अपनी पत्नि और बच्चों के लालन - पालन में लग जाने से, पति को अपनी स्त्री के संरक्षण का दायित्व दिया गया है। इसलिए भाव प्रधान व शरीरबल से हीन स्त्री को कोई बलवान, कपटी व्यक्ति बहकाकर संकट में न डाल दे, शोषण न करले इसी कारुणदृष्टि से ही युवा होने पर उसे वर के गृह आने का विधान किया है। इसी कारण स्त्री को पिता, पति, भाई और पुत्र के संरक्षण में भी रहने का विधान किया है। यहाँ कोई पक्षपात नही है, जैसे हम अपनी भारतीय सेना और पुलिस के संरक्षण को परतंत्रता नही समझते हैं, उसी प्रकार स्त्री के लिए उसके वर के घर जाना और पितादि के संरक्षण में रहना परतंत्रता नही है। स्त्री के संरक्षण को ही ध्यान में रखकर उसका वर के घर जाना निश्चय किया गया है। 
प्रश्न - आप स्त्री को पुरुषों से निर्बल क्यों मानते हो? जबकि स्त्री पुरुषों के समान प्रत्येक कार्य कर रही है। 
उत्तर - भले ही स्त्री पुरुषों की भाँति कार्य कर रही है किन्तु उनकी शारीरिक संरचना पुरुषों  से अपेक्षाकृत कम बलिष्ठ है। इसी कारण केन्द्र और राज्य सरकार द्वारा सेना और पुलिस में शारीरिक परीक्षण के दौरान महिलाओं को विशेष छूट दी जाती है। जहाँ पुरुष को नौ सेना में भर्ति के लिए 157 सेंमी लम्बाई निर्धारित है वहीं महिलाओं को 152 सेमी। यदि महिलाऐं पुरुषों से अपेक्षाकृत निर्बल शरीर की न होती तो सेना आदि में भर्ति के शारीरिक मानदंड दोनों के समान होते किन्तु ऐसा नही है। 
अतः छद्म नारीसशक्तिकरणवादियों से सावधान रहकर अपनी परम्पराओं के वैज्ञानिक और उधारवादी रहस्यों को समझना चाहिये। 
इस लेख को भी अवश्य पढें - 

Monday, January 21, 2019

बौद्ध मत में नर्क का वर्णन भाग - 3

हिन्दू पुराणों में आये हुए नर्कों के वर्णनों को अम्बेडकरवादी पाखंड कहते हैं किन्तु बौद्ध ग्रंथों में आये हुए नर्कों के वर्णनों को ये लोग या तो क्षेपक कहते हैं या फिर मनुष्य की ही मानसिक अवस्था बताते हैं। अतः यहाँ हम कुछ प्रमाणों के आधार पर ये सिद्ध करने जा रहे हैं कि एक बौद्ध ग्रंथ में नही अपितु अनेकों बौद्ध ग्रंथों में नर्कों का वर्णन है इसलिए यह क्षेपक नही हो सकता है तथा बौद्ध ग्रंथों में आए हुए नर्क कोई मानसिक अवस्था या मनुष्य को मिलने वाला दुःख मात्र ही नही है अपितु बौद्ध ग्रंथ में जो नर्कों का वर्णन है वे स्थान विशेष है जैसे कि गरुड पुराणादि पुराणों में है। इससे पूर्व इसी विषय पर इस ब्लोग में हम दो पोस्टे प्रकाशित कर चुके हैं।
अब इसी विषय पर तृतीय पोस्ट भी देखे -
बौद्ध ग्रंथों में अभिधम्म पिटक त्रिपिटकों में से एक है। बुद्ध के दार्शिनिक उपदेशों का संग्रह इसी अभिधम्म पिटक में मुख्य रुप से तथा अन्य पिटकों से अधिक किया गया है। इस ग्रंथ पर अनेकों टीकाऐं और साहित्य लिखा जा चुका है। उन्हीं में से एक है आचार्य अनिरुद्ध द्वारा रचित अभिधम्मत्थसङ्ग्रहों इसी ग्रंथ में चार प्रकार की भूमियों का वर्णन किया गया है, जिसमें से एक का नाम निरय अर्थात् नर्क है।
                                                                         - अभि.सं. 5.4
जातक अट्ठ कथा और अभिधम्म कोश में इन निरय अर्थात् नर्कों को आठ प्रकार का बताया है, बिल्कुल उसी तरह जैसे गरुडादि पुराणों में है -
"वह निरय सञ्जीव, कालसुत्त, सङ्घात, जालरौरव, धूमरौरव, तापन, पतापन, एवं अवीचि इस तरह आठ प्रकार का है" - अभि.को. 3.58, जातक दि. भाग. पृ.65
इस वर्णन से स्पष्ट है कि बौद्ध लोग नर्क किसी काल्पनिक स्थान विशेष को ही मानते हैं न कि दुःख विशेष को।
एक अन्य प्रमाण भी इस तथ्य को स्पष्ट करता है, जिसके अनुसार नर्क की स्थिति दर्शायी गई है -
"कहते हैं कि ये पृथ्वी 240000 योजन गम्भीर है। वह 120000 योजन मृत्तिकामय है, शेष 120000 योजन पर्यन्त पाषाणमय है। ऊपर के 120000 योजन वाले मृत्तिका भाग में क्रमशः ऊपर से नीचे 8 निरय होते हैं। एक निरय से दूसरे निरय के मध्य 15000 योजन का अन्तर होता है।" - अभि.को. 3.58 पृ. 371-372
यहाँ स्पष्ट है कि बौद्धों में नर्क नामक काल्पनिक स्थान का अंधविश्वास विद्यमान है, इतना ही नही ये यमराज को भी मानते है, जैसा कि मज्झिम निकाय अट्ठकथा और उपरिण्णाट्ठकथा में है -
 इस वर्णन के अनुसार चातुर्महाराजिक देवों में परिगणित वैमानिक प्रेतराज को यमराज कहा गया है। ये यमराज नर्क में आनेवाले लोगों से उनके कर्मों और सत्वों के बारे में पूछताछ करते हैं। इस तरह का वर्णन अंधविश्वास और गप्पों में पुराण, कुरान, बाईबिल सभी को मात दे रहा है। यमराज ही नही बल्कि बौद्धों का अंधविश्वास नरकपालों की भी कल्पना कर लेता है, जैसे कि मज्झिम निकाय अट्ठकथा पृ. 164, उपरिपण्णासट्ठकथा, अङुत्तरनिकाय अट्ठकथा द्वितीय भाग पृ. 118, मिलिन्दपञ्हो पृ. 70-71 आदि ग्रंथो में आया है -
इस वर्णन के अनुसार नरकपाल देवराक्षसों में से एक है। इनका कार्य उन लोगों को नर्कों से मुक्ति दिलाना है जिनके अशूभ कर्म कम हों तथा उन लोगों को नर्क में भयंकर यातनाऐं देना है जिनके बूरे या अशूभ कर्म अधिक होते हों। 
इस वर्णन के पश्चात् शायद ही कोई जल्पवादी ही होगा जो ये नही मानेगा कि स्वर्ग और नर्क रुपी अंधविश्वास बौद्धों में भी प्रचुर मात्रा में है। 
इन नर्कों का जैसा वर्णन बौद्ध साहित्यों में है वैसा ही यहाँ प्रस्तुत करते हैं - 

- अभि.को. पृ. 372
- अट्ठकथा पृ. 307, अभि.को. पृ. 53, 
इस प्रकार 8 नर्कों का वर्णन है, जिन्हें बौद्ध मानते थे। बौद्धों की अंधविश्वास की उडान नर्कों तक ही सीमित नही रही बल्कि उनकी कल्पना की उडान उपनर्कों तक जा पहुँची। मज्झिम निकाय पृ. 2.57, अभि. को. 3.59, खुद्दकनिकाय, मज्झिम निकाय आदि ग्रंथों में वर्णन है। इनका वर्णन यहाँ लेख के विस्तृत होने के भय से नही दिया जा रहा है अतः पाठकगण इसे इन्ही ग्रंथों से देख लेवें। 
बौद्ध धम्म को वैज्ञानिक धम्म मानने वाले नवबौद्धों को अब विज्ञान द्वारा अपने इन काल्पनिक नर्कों के अस्तित्व को सिद्ध करना होगा अन्यथा उन्हें ये मानना होगा कि नर्क की कल्पना बौद्ध मत में भी अन्य मतों के समान है अर्थात् बौद्ध धम्म में भी अंधविश्वास और कल्पनाऐं है। इन वर्णनों से ये भलीभाँति सिद्ध है कि बौद्धों में नर्क स्थान विशेष का ही नाम है न कि मनुष्यों के जीवन में आनेवाले दुःखों का। 

संदर्भित ग्रंथ एवं पुस्तकें -                                                                                            
1) अभिधम्मत्थसङ्ग्रहो - अनु. प्रो. रामशंकर त्रिपाठी

Sunday, January 13, 2019

डॉ. अम्बेडकर की 22 प्रतिज्ञाऐं बौद्ध धम्म के भी विपरीत है।

हमारे नवबौद्ध आजकल लोगों को बौद्ध धम्म में दीक्षित करने के लिए अनिवार्य रुप से 22 प्रतिज्ञाऐं पढवाते हैं। ये 22 प्रतिज्ञाऐं जहाँ हिन्दू विरोधी है वहीं ये बौद्ध धम्म से भी विरोध खाती है। अतः ये 22 प्रतिज्ञा पढ़ कर जो बौद्ध बनते हैं, वे वास्तविक बौद्ध न होकर केवल अम्बेडकरवादी मात्र ही बनते हैं। प्रथम तो ये 22 प्रतिज्ञाऐं बौद्धों के किसी प्राचीन या प्रमाणिक आचार्यों की पुस्तकों में नही है। दूसरा इस प्रार्थना की पहली पंक्ति ही बुद्ध धम्म के विपरीत है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि 22 प्रतिज्ञाओं में प्रथम प्रतिज्ञा है -
मैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कोई विश्वास नहीं करूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा
इस प्रतिज्ञा में लिखी बात कि ब्रह्मादि देवताओं पर विश्वास नही करुँगा ये बुद्ध धम्म और उनके शास्त्रों के विपरीत है क्योंकि बौद्ध वाङ्मय में जगह - जगह ब्रह्मादि देवताओं का वर्णन है अतः उन पर अविश्वास कोई भी बौद्ध कर ही नही सकता है। इन पर अविश्वास करने का अर्थ है अपने ही बौद्ध ग्रंथों को झुठलाना। बौद्ध धम्म में ब्रह्मा का महत्त्व क्या है? इसका पता मिलिन्द प्रश्न से चलता है जिसके अनुसार - 
बुद्ध, धम्म का उपदेश ब्रह्मा से प्रार्थना करने के बाद ही देते हैं अर्थात् बिना ब्रह्मा से प्रार्थना किये कोई भी बुद्ध अपने धम्म का उपदेश नही करता है। इतना ही नही इसमें ब्रह्मा को तपस्वी, अलौकिक, ज्ञानी भी माना है। अतः मिलिन्द प्रश्न 4.5.51 के विपरीत अम्बेडकर की प्रथम प्रतिज्ञा होने से यह बौद्ध धम्म के भी विरोध में है। 
अब पाठक निर्णय करें कि क्या 22 प्रतिज्ञा पढकर बौद्ध बनने वाले वास्तविक बौद्ध हैं अथवा किसी की कुंठा के अनुयायी? 
संदर्भित ग्रंथ एवं पुस्तकें - 
1) मिलिन्द प्रश्न - अनु. भिक्षु काश्यप

Thursday, December 20, 2018

बौद्ध धम्म में यौगिक सिद्धियाँ

हमारे बीच कई अम्बेडकरवादी हैं जो हनुमान जी के उडने पर मजाक बनाते हुए दिख जाएंगे तथा कुछ अम्बेडकर वादी ऐसे भी हैं जो ये कहते हैं कि बुद्ध ने मानसिक शांती के लिए ध्यान नामक पद्धति का आविष्कार किया (इसका खंडन पूर्व की पोस्टों में हो चुका है) था किन्तु ब्राह्मणों ने उससे कई काल्पनिक सिद्धियों को जोडकर ध्यान के नाम पर अंधविश्वास फैला दिया। अम्बेडकरवादी अपने बौद्ध ग्रंथों को स्वयं नही पढते हैं इसलिए वे हर तरह की बातों का दोष केवल ब्राह्मणों को ही देते हैं किन्तु जो अच्छा और उनके मतानुकूल है उसे बौद्ध धम्म का मान लेते  हैं इस तरह ये लोग मीठा - मीठा गडप कर जाते हैं और कडवा - कडवा थूक देते हैं। यहाँ हम मज्झिम निकाय के राहुल सांस्कृत्यान द्वारा अनुवादित एक पृष्ठ का चित्र प्रस्तुत करते हैं जिसमें वे सारी सिद्धियों को बुद्ध ध्यान और विपश्ना से बता रहें हैं जिनके लिए ब्राह्मणों को अम्बेडकरवादी दोष देते हैं अर्थात् उन सभी सिद्धियों को बुद्ध भी मानते हैं।
                                                                         - आकङ्खेय्य सुतन्त 1.1.6 मज्झिम निकाय
इस सुत्त के अनुसार बुद्ध का मानना है कि ध्यान और विपश्ना से कई यौगिक सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, जैसे - आकाश गमन, पूर्व जन्मों को जान लेना, लोक -लोकान्तर के निवासियों को देखना, पानी पर चलना, अनेकों हो जाना, सूर्य और चन्द्रमा को हाथ से छूना ( यहाँ हनुमान जी के सूर्य को निगलने पर हिन्दूओं को अधंविश्वासी कहने वाले बौद्ध अब बौद्ध धम्म को भी अंधविश्वासी माने)  आदि।
अतः जो भी अम्बेडकरवादी हिन्दूओं को पाखंड फैलाने वाला बताते हैं वे अब ये भी स्वीकार करें कि पाखंड भी बौद्धों के द्वारा फैला है अन्यथा हनुमान जी आदि महापुरुष देवों और हिन्दू ग्रंथों पर कटाक्ष करना बंद करें। जो सिद्धियाँ हिन्दूओं के साहित्यों में उनके देवों द्वारा प्रदर्शित की जाती हैं वही सिद्धियाँ बौद्ध ग्रंथों में भी है ये बात अब सिद्ध हो चुकी है।
संदर्भित ग्रंथ एवं पुस्तकें - 
1) मज्झिम निकाय - राहुल सांस्कृत्यायन