Sunday, May 20, 2018

शूद्र और धन संग्रह


मनुस्मृति में निम्न श्लोक है - 
शक्तेनापि हि शूद्रेण न कार्यो धनसंचय।
शूद्रो हि धनमासाद्य ब्राह्मणानेव।। - मनु 10.129
इस श्लोक में कहा है कि शूद्र यदि समर्थ हो तो भी धन संचय न करें, क्योंकि धन पाकर वह विद्वानों या सत्यपुरूषों को ही बाधा देता है। 
इस श्लोक को कई लोग शूद्र विरोधी समझ लेते है। जबकि उन्हें सोचना चाहिए कि शूद्र को आजीविका के लिए शास्त्रों में शिल्प विद्या का प्रावधान है और लोक में भी देखा जाता है कि प्राचीन भारत में रथकार, तक्षक, नाई आदि अपनी - अपनी शिल्प विद्या से अपनी-अपनी आजीविका चलाते थे फिर यह श्लोक विपरीत नहीं दिखता? यहां तक की मनु 10.121-122 तक के भी विरोध है जिसमें लिखा है कि शूद्र सेवा कार्यपूर्वक जीविका चलाए। साथ ही विप्रों को भी शूद्र की जीविका का निर्धारण करना मनु. 10.124 में बताया है तो फिर 10.129 में बिल्कुल विपरीत बात क्यों? 
इसका उत्तर है कि हमें पहले किसी भी श्लोक को क्षेपक मानने से पूर्व उसकी अन्य शास्त्रों और वेद सम्मत अर्थों से संगीति लगाने का प्रयास करना चाहिए यदि किसी जगह कोई विरोधी कथन या विरोधाभास कथन प्रतीत हो वहां अन्य शास्त्रों और वेदों से उचित अध्याहार कर, अर्थ निर्धारण करना चाहिए यदि इसमें भी सफल न हों तब उसे क्षेपक मानना चाहिए। इसके लिए अन्य शास्त्रों का भी अध्ययन आवश्यक है जैसे कि शुक्रनीति में लिखा है कि - 
"एकं शास्त्रमधीयानो न विन्द्यात् कार्यनिर्णयम्"- शुक्रमीति 3.131 अर्थात् एक शास्त्र के अध्ययन से तत्व का ज्ञानं अथवा व्यवहार का निर्धारण नहीं हो सकता है। इस तरह अनेक शास्त्रों को भलीभांति प्रकार से विचार कर तत्व का निर्धारण करना चाहिए। यहां भी हमें अन्य शास्त्रों पर विचार करते है तो समझ आता है कि शूद्र के दो प्रकार हैं - 
1) एक तो वह जो विद्या प्राप्त न कर सका और व्रात्य संज्ञक हो कर शूद्र हो गया अथवा जिसनें अपने द्विजान्तर्गत या विप्रान्तर्गत कार्यों का त्याग कर अन्य आजीविका के लिए वृत्ति अपना ली हो जैसे कि कुम्भकार की, नील बैचने वाले की, नाई की, तेल बेचने की आदि। 
व्रात्य संज्ञा का उल्लेख मनु ने भी किया है -
"सावित्रिपतिता व्रात्या भवन्त्या.." - मनु 2.39 अर्थात् जो सावित्री अर्थात् संस्कारों और वेदों से पतित हो जाए वह व्रात्य है।
दूसरे शूद्र है जो कुकर्म करने लगे, मांस भक्षण करने लगे और दूसरो को ठग कर या सता कर धन कमाने लगे अथवा जो कटुवचन बोले, शराबादि पिये ऐसे व्यक्ति वृषल संज्ञक हो कर शूद्र कहे जाते है। 
मनु में वृषल की परिभाषा में आया है -
"वृषों हि भगवान् धर्मस्तस्य यः कुरूते ह्मलम्।
वृषलं तं विदुर्देस्तस्मार्ध्दमं न लोपयेत्।। - मनु. 8.13
वृष नाम ईश्वर के धर्म का है और जो इसका लोप कर दे या धर्म का पालन न करें वह वृषल है। 
वृषल का शूद्र अर्थ अमरकोश में भी है - "शूद्राश्चावरववर्णाश्च वृषल" -अमरकोश 2.10.1 
इनहीं दो प्रकार के शूद्रों का उल्लेख अष्टाध्यायी में निम्न प्रकार किया है - 
"शूद्राणाम निरवसितानाम्" - अष्टां2.4.10 अर्थात् शूद्र दो प्रकार के है - पहला निरवासित अर्थात् बहिष्यकृत शूद्र और दूसरा अनिरवासित अर्थात् अबहिष्यकृत शूद्र। 
यदि इसी निरवासित अर्थात् वृषल संज्ञक शूद्र का अध्याहार उपरोक्त मनु के श्लोक में कर लेंवे तो अर्थ आता है - 
"वृषल अर्थात् निरवासितों को धन का संग्रह नहीं करना चाहिए, क्योंकि उस धन से वह सज्जनों को परेशान ही करेंगे। 
और ऐसा लोक में भी देखा जाता है कि दुष्ट लोग या धर्मभ्रष्ट लोग अपने धन का दुरूपयोग सट्टेबाजी में, नशीले पदार्थ बैचने में, वैश्यावृत्ति में व्यय करते है और धन के द्वारा हथियार लेकर अराजकता भी फैलाते है, लूटादि करते है जैसे कि भीमसेना,, साथ ही धर्म विरूद्ध प्रचार भी करते है। अतः ऐसे ही शूद्रों अर्थात् वृषलों का ही धन संग्रह का निषेध है बाकि अन्य शूद्रो को तो अपने सामर्थ्य अनुसार सेवा भाव से आजीविका करने का पूरा अधिकार है ही।
संदर्भित ग्रन्थ एवं पुस्तकें - 
1) मनुस्मृति - अनु. सुरेन्द्र कुमार
2) शुक्रनीति - अनु. स्वामी जगदीश्वरानन्द
3) अष्टाध्यायी - मूलमात्र
4) जाति निर्णय - पं. शिवशंकर शर्मा काव्यातीर्थ

वैदिक धर्म और युद्धबंदियों से व्यवहार


कार्तिक अय्यर
।।ओ३म्।।
हमने अकसर अंबेडकरवादी लेखक यथा, डॉ सुरेंद्रकुमार अज्ञात, राकेश नाथ तथा डॉ अंबेडकर आदि व अनवर जमाल, सनाउल्ला जैसे इस्लामिक विद्वानों को कहते सुना है कि वैदिक धर्म में भी इस्लाम की तरह या किसी जंगली सभ्यता की तरह युद्ध में पकड़ी औरतों से भोगना लिखा है। हम इस विषय पर कुछेक लेख रखना चाहते हैं।
दरअसल ऐसे आक्षेप पहले पहल सुरेंद्रकुमार आदि अंबेडकरवादी नास्तिकों ने ही लगाये हैं। उनकी देखा देखी इस्लामिक विद्वान भी शुरु हो गये!
हम महाभारत से युद्धनीति संबंधी कुछ तथ्य पाठकों के समक्ष रखना चाहते हैं। उन प्रमाणों के साथ विशेष व्याख्या भी करते जायेंगे । अवलोकन कीजिये:-
(सब प्रमाण गीताप्रेस संक्षिप्त महाभारत,भाग-२,शांतिपर्व से लिये गये हैं।)
(क):- बलहीन शत्रु से भी सहानुभूति रखें तथा जरूरत पड़ने पर उसकी चिकित्सा करावें।
जो शत्रु बलहीन,जिसका पुत्र मर गया जिसके शस्त्र नष्ट हो गये,जो विपत्ति में पड़ गया हो,जिसकी धनुष की डोरी टूट गई हो अथवा जिसका वाहन नष्ट हो गये हों,उस पर कभी वार न करें। ऐसा पुरुष अपने शिविर में आ जाये तो उसकी चिकित्सा करावे अथवा उसके घर पहुंचा दें-यही सनातन धर्म है। अतः धर्मानुसार ही युद्ध करना चाहिए। यह बात स्वायंभुव मनु ने भी कही है।
( दूसरा पैराग्राफ ९ वीं पंक्ति से)(पृष्ठ संख्या ३३५)
(ख) शत्रुओं को बंदीगृह से आजाद करने की तथा जीते हुये सामान को एक साल बाद उसके स्वामी को सौंपने की आज्ञा।
जिस योद्धा का कवच टूट गया हो,जो "मैं आपका हूं" ऐसा कह रहा हो,जो हाथ जोड़े खड़ा हो या जिसने हथियार रख दिये हों उसे कैद कर ले,मारे नहीं।एक साल तक कैद रहने के बाद उसका नया जन्म होता है और वह विजयी राजा के पुत्र के समान हो जाता है;इसलिये सालभर बाद उसे छोड़ देना चाहिए।.... इसी प्रकार धन या दास-दासी(यहां गिलमा या रखैल का अर्थ मत ले लेना। जो सेवक हैं,दूत हैं, आदि वे दास दासी हैं।उनको उचित वेतन मिलता है जैसाकि चपरासी,वॉचमैन,खानसामा आदि को) जो अपने पराक्रम से जीतकर लावे,उसे भी एक साल तक अपने पास रखकर फिर उसके स्वामी को सौंप दें।
( पैराग्राफ ६ पंक्ति ६)(पृष्ठ ३३५)
देखिये! कितना ऊंचा आदर्श है! किसी भी असावधान व्यक्ति पर वार करने का निषेध है(जबतक वो महा अधर्मी न हो,तब तक) हमलावर शत्रु तक तो युद्धविराम के बाद पुत्र के समान मानकर रिहा करना लिखा है।
(ग):- विजेता राजा जीते हुये देश की प्रजा को समझावे बुझावे तथा उसे पारितोषिक देकर प्रसन्न रखें व यथायोग्य पालन करे:-
आक्रमण करने वाले राजा को विजय करने के बाद(यानी हमलावर को जीतकर) उस देश के बिगड़े हुये लोगों को समझा बुझाकर और पारितोषिक देकर प्रसन्न कर लेना चाहिए। यदि ऐसा न हो,उनके साथ कड़ाई का बर्ताव किया जाता हो तो वे दुखी होकर अपने देश से चले जाते हैं और शत्रुओं के साथ मिलकर विजयी राजा की विपत्ति के समय बाट देखने लगते हैं।(पेज ३३६, पैराग्राफ १ पंक्ति ४ से)
यहां पर ये भी कहा गया है कि यदि कोई कन्या युद्ध में मिली हो, तो एक साल तक उससे कुछ न पूछे। यदि युद्ध शांत होने के बाद वो कहे कि वो किसी और पुरुष को चाहती है, तो उसे ससम्मान विदा कर दे।
आगे देखिये:-
"जिसको एक बार कैद किया हो उस मंत्री से और पराई स्त्रियों से, ऊंचे नीचे एवं दुर्गम पहाड़ से और हाथी घोड़े,तथा सर्पों से बचकर रहे।
.हों
वन्ध्याओं,वेश्याओं, परस्त्रियों और कुमारी कन्याओं के साथ समागम न करें।"
( महाभारत शांतिपर्व पेज ३३१ पैराग्राफ १)
यहां स्पष्ट रूप से युद्धबंदी स्त्री से सम्मान से पेश आना, उनसे जोर जबरदस्ती न करना लिखा है। साथ ही, राजा को परस्त्रीगमन का पूर्ण रूप से निषेध है। तब कैसे मान लिया जाये कि युद्धबंदी स्त्रियों से संभोग करना वैदिक धर्म में विहित है?
संदर्भित ग्रन्थ - महाभारत(संक्षिप्त) - गीताप्रेस गोरखपुर

विनय पिटक में बुध्द का बित्ता और भिक्षु की कुटिया !!


बुध्द के उपदेश तीन पिटकों (पिटारियों) में बंटे हैं , विनय पिटक, सुत्त पिटक और अभिधम्म। राहुल सांस्कृतायन इनमें से अभिधम्म को बाद का मानते हैं।साथ ही त्रिपिटक की अनेक गाथाओं को 'पच्छा पक्खित्ता' अर्थात् पीछे डाली गयी मानते हैं।राहुल सांस्कृतायन ने विनय पिटक का हिंदी अनुवाद किया है (चित्र 2)। विनय कहते हैं नियम को। चूंकि इस पिटक में भिक्षु-भिक्षुणियों के आचार संबंधी नियम तथा उनके इतिहास और व्याख्याओं को जमा किया गया है, इसलिये इसका नाम विनय पिटक है। यह एक वृहद् ग्रंथ है जो अधिकतर हास्यास्पद, अव्यवहारिक, परस्पर विरोधी और परिस्थिति जन्य समझौतावादी वचनों से भरा पड़ा है।
विनय पिटक में भिक्षु-भिक्षुणियों के तेरह दोषों को बताया गया जिन्हें संघादिसेस के नाम से जाना जाता है (चित्र)। चूंकि इन दोषों के पाये जाने पर दंड देने का अधिकारी एक या अनेक भिक्षु ना होकर संघ है, इसलिये इन तेरह दोषों को संघादिसेस कहा जाता है। इन तेरह दोषों में दूसरा दोष है 'कुटी निर्माण'। अर्थात् बताये गये नियम के अनुसार यदि भिक्षु ने अपनी कुटी का निर्माण नहीं किया तो यह दोष लगता है। कुटि निर्माण का यह नियम कि इसके बनाने की जगह किसी भी प्रकार की जीव हिंसा ना हो उचित है। यह कोई नया नियम भी नहीं है जिसकी बात सनातन धर्म ने ना की हो। लेकिन यह नियम कि कुटिया की लंबाई और चौड़ाई का पैमाना बुध्द का बित्ता हो हास्यास्पद है। जैसे इतने बित्ता लंबाई और उतने बित्ता चौड़ाई। उलंघ्घन करने पर भिक्षु संघादिसेस के घेरे में और संघ से कुछ काल के लिये तड़ीपार। जब किसी को बुध्द की सही लंबाई ही नहीं पता तो बित्ता कितने इंच का होगा नहीं तय किया जा सकता है। राहुल सांस्कृतायन भी निश्चित नहीं हैं इस बारे में। बस मान लेते हैं कि बुध्द 6 फुट के रहे होंगे। यदि मान लिया जाये कि बुध्द 6 फुट के थे तो उनका बित्ता लगभग 9 इंच का रहा होगा।
लेकिन समस्या यह है कि कुटिया में बुध्द को नहीं बल्कि भिक्षुओं को रहना है। भिक्षु 4 फुट का भी हो सकता है और 7 फुट का भी। इस स्थिति में हर भिक्षु के लिये अलग-अलग माप की कुटिया होनी चाहिये ना कि बुध्द के बित्ते से ही सबको हाँक दिया जाये। यदि विनय पिटकवादी यह तर्क दें कि मठ में एक ही नाप की कुटिया होनी चाहिये तो बात समझ में आती है। लेकिन फिर प्रश्न उठता है कि क्या उस काल में विनय पिटकवादियों को माप की पध्दति का ज्ञान नहीं था या बुध्द के बित्ते से मोहित थे ? क्या आज भी सभी भिक्षु ( बामसेफी भिक्षुओं को सम्मिलित कर ) बुध्द के बित्ते के हिसाब से कुटिया बनाते हैं ? अंतिम प्रश्न है कि बुध्द के बित्ता सम्मत कुटिया निर्माण ना होने से दोष कैसे लग जायेगा, क्यों लग जायेगा और इस दोष के पीछे क्या विज्ञान है ?
पाठकों के पास भी कुछ प्रश्न हों तो टिप्पणी में उठायें
- अरूण लावनिया 

बामसेफी बुध्द के विपरीत चलता है !!!

अंबेडकरवादी दो प्रकार के होते हैं। पहले वो जो डा. अंबेडकर को तो मानते हैं लेकिन इसके बावज़ूद भी स्वयं के हिंदू होने पर गर्व करते हैं। दूसरे वो जो डा. अंबेडकर के अनुयायी होने का ढोंग करते हुये और उनके नाम पर हिंदू धर्म को गालियां देने में लगे रहते हैं। दूसरी प्रजाति बामसेफियों की है जिनसे हमारा विरोध है। जो धर्म, राष्ट्र, संस्कृति और समाज के लिये विष हैं। बामसेफी जब बुध्द को वेद से पहले का साबित करना चाहते हैं तो एक बड़ी समस्या से इन्हें निपटना पड़ता है। समस्या यह कि संपूर्ण बौध्द साहित्य दो शब्द, श्रमण और ब्राह्मण, से भरा पड़ा है। सिद्धार्थ के जन्म से पहले ब्राह्मण, सिद्धार्थ के महामाया के गर्भ में रहते ब्राह्मण, सिध्दार्थ के जन्म के समय ब्राह्मण, जवानी में ब्राह्मण, महल छोड़ने के बाद ब्राह्मण, ज्ञान प्राप्त करने से लेकर निर्वाण तक ब्राह्मण ही ब्राह्मण। समस्या गंभीर ! श्रमण को तो सन्यासी कह बामसेफी राहत की सांस ले लेता है, लेकिन ब्राह्मण का जो पेंच बुध्द के संपूर्ण जीवन में फंसा है उससे कैसे बचाव करे ? क्योंकि ब्राह्मण शब्द वेद की ओर ले जाता है जिससे वेद स्वत: बुध्द के पूर्व के सिध्द हो जाते हैं। इसकी काट के लिये सभी बामसेफी एक स्वर में बौध्द ग्रंथों में आये ब्राह्मण शब्द का अर्थ अर्हत् कर देते हैं। अर्हत् अर्थात् पूज्य ना कि वेद वाला ब्राह्मण। ऐसा अर्थ करने से उनके अनुसार वेद बुध्द के बाद के सिध्द हो जाते हैं। ये तो रहा बामसेफियों का तर्क। लेकिन बुध्द क्या बामसेफियों से सहमत हैं ? क्या वो भी ब्राह्मण को अर्हत् कहते हैं ? आइये उन्हीं के वचनों से जानें ?
त्रिपिटक बौध्द धर्म का प्रमाणिक ग्रंथ है। इसके सुत्त पिटक के दीघ निकाय के महापरिनिब्बाण सुत्त के अनुसार बुध्द राजगृह में गृध्रकूट पर्वत पर विहार कर रहे थे। अजातशत्रु वज्जियों ( वर्तमान मुजफ्फर नगर, चंपारन, दरभंगा जिले के) के विरुध्द था और उनपर आक्रमण करना चाहता था। उसने वर्षकार नामक ब्राह्मण को बुध्द के पास उनकी राय लेने भेजा। ब्राह्मण बुध्द के समीप जाकर बोला कि अजातशत्रु वज्जियों को नष्ट करना चाहता है। उस समय आनंद बुध्द को पंखा झल रहे थे। तब बुध्द ने वज्जियों की प्रशंसा करते हुये आनंद को संबोधित किया। दोनों के मध्य ब्राह्मण की उपस्थिति में लंबा संवाद हुआ। बुध्द ने कहा :
"...वज्जी लोग अर्हतों ( पूज्यों ) की अच्छी तरह धार्मिक ( धर्मानुसार ) रक्षा=आवरण=गुप्ति करते हैं। किसलिये ? भविष्य में अर्हत राज्य मेँ आवें, आये अर्हत् राज्य में सुख से विहार करें। "
" सुना है, भंते ! "
तब भगवान् ने वर्षकार ब्राह्मण को संबोधित किया -
" ब्राह्मण ! एक समय मैं सारन्दद-चैत्य में विहार करता था।...जबतक ब्राह्मण ! यह सात अपरिहाणीय धर्म वज्जियों में रहेंगे...; (तबतक) ब्राह्मण ! वज्जियों की वृद्धि ही समझना, हानि नहीं (चित्र 1)। "
इस संवाद में भगवान् बुध्द स्पष्ट रूप से अर्हत् और ब्राह्मण को एक नहीं मान रहे हैं। उनके अनुसार दोनों अलग-अलग हैं। यदि दोनों को एक ही मानते तो वर्षकार को ब्राह्मण नहीं अर्हत् ही कह संबोधित करते।
अत: बामसेफियों का यह प्रलाप कि ब्राह्मण का अर्थ अर्हत् होने से वेद बुध्द के बाद के हैं झूठा और बुध्द के विपरीत है।
#भीमसेना #बामसेफ #भारतमुक्तिमोर्च #अंबेडकर
-अरुण लवानिया

बामसेफी बुध्द को भी नहीं मानता !!! भाग -1



राजेंद्र प्रसाद सिंह जैसे बामसेफी भाषाविद् अशोक के पूर्व संस्कृत का कोई भी शिलालेखी, स्तंभलेखी या ताम्रपत्रीय प्रमाण उपलब्ध ना होने से संस्कृत ,वेद, मनुस्मृति रामायण, महाभारत आदि ग्रंथों को बुध्द और अशोक के बाद का घोषित करते हैं।इसलिये संस्कृत पाली से बाद की और इसकी अपभ्रंश भाषा है ऐसी इनकी मान्यता है। इस बात का ये जोर शोर से प्रचार भी करते हैँ। जबसे राजेंद्र प्रसाद सिंह की पोस्ट का एक-एककर खंडन किया जा रहा है इसने भी अपनी पिछली पोस्टों में दिये गये तथ्यों को बदलना शुरू कर दिया है।उदाहरण स्वरूप पहले इसका कहना था कि ईसा के 150 साल बाद ही संस्कृत के अभिलेख मिलने शुरू हुये हैं। जब इसे ईसा के लगभग सौ साल पूर्व के संस्कृत के ब्राह्मी लिपि में ' यवनराज अभिलेख', जो मथुरा के सरकारी पुरातत्व विभाग में हैं, के सबूत देकर इसे झूठा साबित कर दिया गया तो इसने अपनी बात में संशोधन कर कहना शुरू कर दिया है कि मौर्य काल के पहले संस्कृत के कोई अभिलेख नहीं मिलते हैं। लिपि और भाषा दो अलग बाते हैं लेकिन बामसेफियों का मानना है कि लिपि पहले है और भाषा इसके पश्चात्। इस तर्क से तो जन्म लेने के बाद एक शिशु लिपि का ज्ञान प्राप्त करने के बाद ही बोलना शुरू करता है। शायद बामसेफियों के घर जन्में बच्चे ही ऐसा करते हों। इतना ही नहीं,ये बामसेफी भाषाविद् पुरातत्वीय खुदाई मे मिले अभिलेखों से भाषा की प्राचीनता भी साबित करते हैं जो सरासर मूर्खता है।
चूंकि श्रुति परंपरा के विज्ञान से वेद बिना लिपिबध्द हुये भी बुध्द से पूर्व से पीढ़ी दर पीढ़ी बिना किसी परिवर्तन के सुरक्षित चले आ रहे हैं, खुदाई में प्राप्त अभिलेखों के आधार पर भाषा की प्राचीनता को तय करना भाषाविद् की अल्पबुध्दि को ही उजागर करता है। भाषाविज्ञान को कुछ समय के लिये लंबित कर यदि हम बुध्द के वचनों पर ही गौर करें तो वेद का उनके पूर्व का होना सरलता से सिध्द हो जाता है। इस लेख में यही साबित किया जायेगा।
त्रिपिटक बौध्द धर्म का प्रामाणिक ग्रंथ है जिसमेँ तीन पिटारियां हैं- विनय पिटक ,सुत्त पिटक और अभिधम्म पिटक। सुत्त पिटक में पांच निकाय ग्रंथ हैं जिसमें पहला दीघ निकाय है। लगभग तीन सौ पृष्ठ के इस ग्रंथ में ऐसा कोई भी पृष्ठ नहीं है जहाँ बुध्द ब्राह्मण का उल्लेख ना करते हों। दीघ निकाय के तेरहवें तेविज्ज सुत्त के शुरू के ही अंश साबित कर देते हैं कि बुध्द भी वेद को अपने से पूर्व का ही मानते हैं।दीघ निकाय का हिंदी में अनुवाद बौध्द विद्वान भिक्षु राहुल सांस्कृतायन और भिक्षु जगदीश कश्यप ने 1934 ईस्वी मेँ किया (चित्र 2)। इसे देश के जाने माने दलित प्रकाशन 'गौतम बुक सेंटर' ने प्रकाशित किया है (चित्र 3)। इसलिये जो प्रमाण इससे दिये जायेँगे उसे बामसेफी यह कहकर भी नहीं अमान्य कर सकते कि ब्राह्मणों ने इसमें मिलावट कर दी है।
तैविज्ज सुत्त के नुसार दो तरुण ब्राह्मणों वाशिष्ठ और भारद्वाज मेँ विवाद उत्पन्न हुआ कि क्या ब्रह्मा की सलोकता के लिये शीघ्र पहुंचा देने वाला मार्ग वही है जो ब्राह्मण पौष्करसाति ने कहा है या ब्राह्मण तारुक्ष ने कहा है। विवाद सुलझाने के लिये दोनों तरुण ब्राह्मण तथागत् के पास पहुँचे जो पाँच सौ भिक्षुओं के संग उस समय कौशल देश के मनसाकट नामक ब्राह्मणों के गांव के उत्तर अचिरवती नदी के किनारे आम्रवन में विहार कर रहे थे। उन्होंने तथागत से पूछा :
" हे गौतम ! रास्ते में हमलोगों में यह बात उत्पन्न हुई। यहां हे गौतम ! विग्रह है, विवाद है, नानावाद है।"
इस प्रश्न के उत्तर में तथागत् यह साबित करना चाहते हैं कि सही मार्ग से ब्राह्मण और वेद रचयिता ऋषि अनभिज्ञ हैं। इस बात को लेकर बुध्द का ब्राह्मण से लंबा तर्क वितर्क होता है जिसका छोटा सा अंश चित्र 1 में पढ़ा जा सकता है। यहाँ इसपर चर्चा नहीं की जायेगी कि ऋषि वेद रचयिता नहीं बल्कि मंत्र द्रष्टा थे। चर्चा में ब्राह्मण वशिष्ठ बुध्द के सामने ऐतरेय ब्राह्मण, , तैत्तरीय ब्राह्मण, छन्दोग ब्राह्मण आदि का नाम लेता है। बुध्द त्रैविद्य ब्राह्मण और ब्रह्मा का बार-बार नाम लेते हैं (राहुल सांस्कृतायन ने त्रैविद्य का अर्थ त्रिवेदी किया है)। नीचे दिये चित्र 1 में चर्चा को पढ़ने मात्र से ही यह साबित हो जाता है कि बुध्द स्वयं वेद को पहले का मानते थे। जो ना मानते तो ऐसा संवाद ना करते।
लेकिन बामसेफियों को बुध्द से कोई सरोकार नहीं है।
-अरुण लवानिया

Wednesday, May 16, 2018

बुद्ध की मुर्तियाँ विदेशी वास्तुकला की नकल है।


बुद्ध की जितनी भी मुर्तियां बनी है उनकी वास्तुकला भारतीय नहीं है बल्कि विदेशियों से उधार है। चित्र में एक मुर्ति जो 1500-1200 BC के समय की है और एन्थोलिया से प्राप्त है और इस समय Cyprus Museum, 
Nicosia में है। इस मुर्ति के जो बाल है वैसे ही कर्ली स्टाइल बाल बुद्ध के है तथा मुर्ति की शक्ल एवं सूरत भी बुद्ध प्रतिमा से काफी साम्य रखती है। 
अतः जो बौद्ध हिन्दूओं पर नकलची होने का आक्षेप करते है, वे स्वयं नकलची थे।

आचार्य चाणक्य व ब्राह्मणवाद

 


 कार्तिक अय्यर
भीमसैनिक वामपंथी सदैव आचार्य चाणक्य पर आक्षेप करते दिखते हैं। कभी उनको काल्पनिक कहते हैं, कभी ब्राह्मणवादी , शूद्र विरोधी, स्त्री निंदक कहते हैं। मगर आचार्य चाणक्य भी जन्मना जातिवाद के पक्ष में नहीं थे। हम "चाणक्यनीति" दर्पण से कुछ श्लोक उद्धृत करते हैं।
*चाणक्यनीतिदर्पण*
*एकादशोऽध्यायः,श्लोक सं.-13 से 16*
*लौकिके कर्मणि रतः पशुनां परिपालकः ।*
*वाणिज्यकृषिकर्ता यः स विप्रो वैश्य उच्यते ।।१३।।*
*भावार्थ*―जो ब्राह्मण लौकिक कर्मों में संलग्न हो, पशु पालता हो, व्यापार और खेती करता हो, वह 'वैश्य' कहलाता है।
*――––――――――――––―――――――*
यहां पर व्यापारी ब्राह्मण को वैश्य कहा है। आगे देखिये:-
*लाक्षादितैलनीलानां कुसुम्भमधुसर्पिषाम् ।*
*विक्रेता मद्यमांसानां स विप्रः शूद्र उच्यते ।।१४।।*
*भावार्थ*―जो ब्राह्मण लाखादि पदार्थ, तेल, नील, कुमकुम, मधु, घी, मद्य और माँस―इन पदार्थों का बेचनेवाला हो, उसे 'शूद्र' कहते हैं।
*――––――――――――––―――――――*
यहां मांसादि निकृष्ट चीजें बेचने वाले ब्राह्मण को स्पष्ट रूप से शूद्र लिखा है। इससे सिद्ध है कि आचार्य चाणक्य गुण कर्म स्वभाव की वर्णव्यवस्था व वर्णपरिवर्तन को पूरी तरह से मानते थे।
*परकार्यविहन्ता च दाम्भिकः स्वार्थसाधकः ।*
*छली द्वेषी मृदुः क्रूरो विप्रो मार्जार उच्यते ।।१५।।*
*भावार्थ*―जो दूसरे के कार्यों को बिगाड़नेवाला ढोंगी, अपने ही स्वार्थ-साधन में तत्पर, छली, द्वेषी, ऊपर से अत्यन्त नम्र और अन्दर से क्रूर [ पैनी छूरी ] हो, ऐसा ब्राह्मण 'बिलार' कहलाता है।
*――––――――――――––―――――――*
यहां पर दुष्ट, क्रूर आदि गुण वाले ब्राह्मण को "विडालव्रची" कहा है। ये शब्दप्रयोग महर्षि मनु का भी है। ये पाखंडियों के लिये प्रयोग होता है। और सुनिये:-
*वापी-कूप-तडागानामाराम-सुर-वेश्मनाम् ।*
*उच्छेदने निराऽऽशङ्कः स विप्रो म्लेच्छ उच्यते ।।१६।।*
*भावार्थ*―जो ब्राह्मण बावड़ी, कुआँ, तालाब, आराम [ वाटिका ] और देवालयों [ मन्दिरों ] के तोड़ने-फोड़ने में निडर हो, वह म्लेच्छ कहलाता है।
यहां स्पष्ट रूप से बताया है कि जो ब्राह्मण तोड़ फोड़ करता है, वो म्लेच्छ ही है।
सार यह है कि, चाणक्य जी व्यापारी ब्राह्मण को वैश्य, सेवक व निकृृष्ट चीजें बेचने वाले ब्राह्मण को शूद्र , पाखंडी को वैडालव्रती, और तोड़ फोड़ करने वाले को म्लेच्छ कहते हैं।
इससे सिद्ध है कि आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य गुण कर्म स्वभाव से ब्राह्मण को मानते थे। उनके मत में अपने कर्म छोड़ने पर ब्राह्मण वैश्य,शूद्र,म्लेच्छ आदि बन जाता है।
निष्कर्ष यही है कि चाणक्य मुनि को ब्राह्मणवादी कहना अज्ञान का और हठधर्मिता का सूचक है। भीमसैनिकों को चाहिए कि चाणक्य,मनु आदि को 
पढ़ें, व नीर क्षीर विवेक से अपना मत रखे।
हम ये प्रमाण उपलब्ध कराने हेतु श्री "पंकज शाह आर्यजी" का आभार व्यक्त करते हैं।
[ संदर्भ पुस्तक:-
चाणक्यनीति दर्पण- *अनुवादक: _स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती_* ]