Wednesday, September 19, 2018

डॉ. अम्बेड़कर राष्ट्रवादी नही बल्कि बिरादरी वादी थे। भाग - 3



इस देश की आजादी का अगर कोई सबसे अधिक खिलाफ था तो शायद वो थे डा भीम राव अम्बेडकर।
14 मई 1946 को अम्बेडकर साहब ने इस बाबत अंग्रेजी राज के प्रति अपनी, अपनी जाति कौम की बफादारी को व्यक्त करते हुये ए वी एलेक्जेडर ( A V Alexander) मेंम्बर ऑफ ब्रिटिश केबेनट मिशन , को पत्र भी लिखा था।
गूगल कर सकते इस पत्र को । मिल जायेगा।
इस पत्र मे अम्बेडकर साहब ने लिखा ये देश अगर अंग्रेजो का गुलाम बन सका तो सिर्फ उनकी कौम के लोगो की वजह से। उन्होने लिखा कि किस तरह उनकी बिरादरी ने इस देश को गुलाम बनवाने मे योगदान दिया और गुलाम बनाये रखने मे हमेशा अंग्रेजो का साथ दिया।
जो इन्सान देश को आजाद ही नही देखना चाहता हो उसे उस देश के संविधान की ड्राफ्टिंग कमेटी का अध्यक्ष कैसे बनाया जा सकता है ? संविधान सभा 1946 मे ही बनी थी केबिनेट मिशन की देख रेख मे।

इससे स्पष्ट है कि अम्बेड़कर राष्ट्रवादी नही थे अपितु वे बिरादरी वादी थे। अपनी जाति के लाभ के लिए वे देश को गुलाम रखने के भी पक्षधर थे। उन्हे राष्ट्र प्रेमी बताना सबसे बड़ी मूर्खता है। 
उससे भी बड़ी मूर्खता यह है कि देश के साथ गद्दारी करने वालो को इनाम मे योजनाये और फेवर मे कानून का प्रावधान धरती पर सिर्फ इसी देश मे है।

साभार - प्रितम कुमार

Friday, September 14, 2018

अशोक स्तम्भ नाम से प्रसिद्ध सभी स्तम्भ अशोक के बनवाये तथा अशोक कालीन नही है।

अम्बेड़करवादी अशोक स्तम्भों को बहुत प्रमुखता देते है और उसे बौद्ध मत की उन्नत शिल्प कला के रूप में भी प्रस्तुत करते हैं। इसी के साथ - साथ वे हिन्दूओं पर आक्षेप भी करते हैं कि हिन्दूओं ने बौद्ध मंदिरो और विहारों को कब्जे में करके उसका हिन्दू रुपान्तरण किया है। हालाकि अपनी बात की सिद्धि में वे कोई प्रमाण नही दे सके है किन्तु हम यहां इस बात का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं कि अशोक के नाम से प्रसिद्ध अनेकों स्तम्भ अशोक से पूर्वकालीन है। जिसपर अशोक ने अपनी लिपि खुदवाई थी। इसका विवरण स्वयं अशोक ही ने किया है। दिल्ली टोपरा के शिलालेख में आया है -
धम्मलिबि अत अथि सिला - थम्भानि वा सिला फलकानि वा तत कटविया एन एस चिलठितिके सिया।
  - पंक्ति 22
अर्थात् यह धम्मलिपि, जहाँ शिलास्तम्भ वा शिलाफलक हैं वहाँ खुदवायी जाय, जिससे यह चिरस्थित हो।
इस पंक्ति से यह स्पष्ट होता है कि अशोक ने कई शिला स्तम्भ स्वयं नही बनवाये थे बल्कि उससे पूर्व जो स्मम्भ थे उन पर अपनी लिपि अंकित करवाई थी।

कई इतिहासकारों का ये मानना है कि अशोक के पूर्वकालीन ये स्तम्भ महाभारत कालीन वैदिक याग के पशुयूप या ध्वज स्तम्भ है। इस विषय में दो पुस्तकों के प्रमाण देते है -

इनमें पहला प्रमाण नीलकंठ शास्त्री की पुस्तक नंद और मौर्यकालीन भारत से है तथा दूसरा प्रमाण भारतीय मुर्तिशिल्प एवं स्थापत्य कला से है।

अतः सम्भवतः अशोक ने कई वैदिक स्तम्भो को अपने कब्जे में लेकर उन पर अपनी लिपि खुदवा कर उनका बौद्ध रुपान्तरण किया हो?

साभार - सचिन गिरि गोस्वामी (दूसरी पुस्तक के चित्र उपलब्ध करवाने हैतु)
संदर्भित ग्रंथ एवं पुस्तकें -
1) नन्द एवं मौर्यकालीन भारत - नीलकंठ शास्त्री
2) भारतीय मूर्तिशिल्प एवं स्थापत्य कला - मीनाक्षी कासलीवाल
3) प्राचीन भारत के प्रमुख अभिलेख - डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त

बौद्ध धम्म में श्राद्ध और पिंड दान (डॉ. अम्बेडकर की प्रतिज्ञा का खंडन)


डॉ. अम्बेड़कर ने 22 प्रतिज्ञाओं में से एक प्रतिज्ञा में लिखा है -
मैं श्रद्धा (श्राद्ध) में भाग नहीं लूँगा और न ही पिंड-दान दूँगा. 
लेकिन बौद्ध धम्म में पिंड़ दान न करने वाले को अधार्मिक माना गया है। इस बात का प्रमाण मैं किसी ग्रंथ से न देकर बौद्ध राजा के शिलालेख से ही देता हूँ। 
शिनकोट से एक मंजूषा पर प्राकृत भाषा में ब्राह्मी लिपि में लिखा हुआ शिलालेख प्राप्त हुआ है। मिलिन्द्र के बाद विजयमित्र नामक कोई बौद्ध राजा हुआ उसने बुद्ध के अस्थि अवशेष के टूटे हुए पात्र के स्थान पर नया पात्र स्थापित किया था और इसकी जगह पर एक लेख लिखवाया था जिसमें कुछ पंक्तियाँ है - 
"स शरिअत्र कलद्रे नो शध्रों न पिंडोयकेयि पित्रि ग्रिणयत्रि।"
प्रत्रिथवित्रे विजयमित्रेन अप्रचरजेन भग्रवतु शकिमुणिस समसंबुधस शरिर। 
इसका अर्थ है - उस काल में कोई ऐसा व्यक्ति नही था जो श्रद्धालु हो और पित्रगणों को पिण्ड और उदक दे सके। 
तब अप्रचराज विजयमित्र ने भगवान शाक्यमुनि के सम्यक् शरीर को प्रतिष्ठापित किया और इस पात्र को स्थापित किया। 
इससे स्पष्ट है कि भीमराव अम्बेड़कर ने एक बौद्ध मान्यता को ही नकारा है और यदि पिण्डदान पाखंड है तो ये प्राचीनकाल में बौद्ध मत में भी प्रचलित था अतः पाखंडी ब्राह्मण ही नही अपितु बौद्ध भी थे।
संदर्भ ग्रंथ एवं पुस्तके - 
1) प्राचीन भारत के प्रमुख अभिलेख - परमेश्वरीलाल गुप्त

Wednesday, September 12, 2018

जैन विहार विध्वंसक बौद्ध राजा

नवबौद्ध हिन्दूओं पर ये आक्षेप करते हैं कि हिन्दू राजाओं ने बौद्ध स्थलों को नष्ट करके हिन्दू स्थल बनाये जबकि इस बात का कोई लिखित प्रमाणिक दस्तावेज प्राप्त नही होते हैं। जमनादास नामक एक नवबौद्ध बामसेफी ने एक पुस्तक लिखी थी जिसमें उसने त्रिपति बालाजी को बुद्धिस्ट मन्दिर बताया था और लिखा था कि हिन्दूओं ने इसे कब्जा किया था। जिसका खंडन आपको निम्न ब्लाँग पर मिल जाएगा - http://ambedkaritemyths.blogspot.com/2014/03/1-tirupati-balaji-is-hindu-shrinepart-1.html

हिन्दूओं ने बौद्धों के स्थलों पर कब्जा किया था इस बात का पुष्ट प्रमाण अम्बेडकरवादियों के पास न हो किन्तु हम एक ऐसा प्रमाण प्रस्तुत करते हैं कि बौद्धों ने जैनालयों को ध्वस्त करके अपने स्तूप बनवाये थे।
श्रीलंका के ऐतिहासिक बौद्ध ग्रंथ महावंश में इस बात का प्रमाण मिलता है -
"तं दिस्वान पलायन्तं निगण्ठो गिरिनामको।
पलायति महाकालसीहलो ति भुसं रवि।।"- तैतीसवाँ परिच्छेद 43
तं सुत्वान महाराजा सिद्धे मम मनोरथे।
विहारमेत्थ कारेस्सं इच्चेवं चिन्तयी तदा।। - तैतीसवाँ परिच्छेद 44, महावंस
उस भागते हुए देखकर गिरि नामक जैन श्रमण ने उसे पहचान कर कहा - अरे, महाकाल सीहल तो यह भाग रहे है।
यह सुनकर राजा ने तत्काल निर्णय किया कि यदि मै अपने मनोहर में सफल हुआ तो इस जैनालय (निग्रंथवास) के स्थान पर विहार बनवा दुंगा।

आगे इस सीहल राजा ने द्रविड़ राजा को मार कर उस जैन साधु के विहारास्थल को नष्ट करवा कर बौद्ध विहार बनवाया था -
दाठिकं दमिलं हन्त्वा सयं रज्जमकारयि।।
ततो निगण्ठारामं तं विधंसित्वा महीपति।
विहारं कारयी तत्थ द्वादस परिवेणकं।। - महावंस, तैतीसवाँ परिच्छेद, 78,79
द्रविड़ राजा को मारकर सीहल राजा ने स्वयं सिहांसन ग्रहण किया।
उसके तत्काल बाद राजा ने जैनों के आवास को विध्वस्त कराकर उसके स्थान पर बारह परिवेण वाला रम्य विहार बनवा दिया।
अतः बौद्धों द्वारा जैनालय नष्ट करके उनके स्थान पर स्तूप या बौद्ध विहार बनवाये गये थे न कि हिन्दूओं ने बौद्ध विहारो को नष्ट किया। जो आरोप नवबौद्ध हिन्दूओं पर लगाते थे, वही आरोप बौद्धो पर लगते है और इससे अन्य बौद्ध स्थल संदेहों के घेरे में आ जाते है।

संदर्भित ग्रंथ एवं पुस्तकें - 
1) महावंस - अनुवादक द्वारिका दास शास्त्री

Tuesday, September 11, 2018

डॉ. अम्बेड़कर राष्ट्रवादी नही बल्कि बिरादरी वादी थे। भाग - 2

पिछले लेख में हमने बताया था कि डॉ. अम्बेड़कर अपनी बिरादरी को देश से ज्यादा महत्त्व देते थे। उसी लेख में आगे बढते हुए हम इस लेख में बतायेंगे कि डॉ. अम्बेड़कर ने अपनी बिरादरी के लिए एक अलग देश की भी मांग की थी।

जुलाई 1942 में डॉ. अम्बेड़कर ने एक पार्टी का गठन किया जिसका नाम था - शैडूअल कास्ट फेडरेशन (SCF)।
इस पार्टी के गठन के साथ उन्होने इस बात पर जोर दिया कि - श्ड्यूल कास्ट भी मुस्लिमों की तरह बाकि हिन्दूओं से एक अलग माईनोरिटी है और उन्हे भी एक अलग देश मिलना चाहिये। किन्तु SCF के चुनाव हार जाने से अम्बेड़कर जी का अलग देश का स्वपन धरा का धरा रह गया।
अम्बेड़कर जी दलितों के लिए अलग देश चाहते थे, इसका प्रमाण -

   Ref: - Dr. Ambedkar and untouchability by jeffrelot, chapter - The sheduled cast federation and caste politics, page 80

आज जैसे हम अलग देश की मांग करने वाले खालिस्तानियों को देश द्रोही बोलते हैं और देश का शत्रु कहकर विरोध करते हैं तथा जिन्ना को भी अलग देश बनाने के कारण गद्दार कहते है तो क्या डॉ. अम्बेड़कर अलग देश की मांग करने वाले होकर भी राष्ट्रवादी हो सकते है? हम मानते है कि दलितों पर अत्याचार हुआ था तो क्या इसके लिए इस देश के टुकडे करने की मांग करना उचित है? आज लगभग सभी जातियाँ किसी न किसी बात से पीडित है तो क्या सभी जातियों को अलग देश की मांग करके देश के टुकडे़ कर देने चाहिये? यदि नही तो फिर डॉ. अम्बेड़कर राष्ट्रवादी कैसे है?
क्या उनकी अलग देश की मांग करना उचित है?
क्या वे जिन्ना और खालिस्तानियों के समान स्थान पर नही आते?
साभार - प्रीतम कुमार 
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डॉ. अम्बेड़कर राष्ट्रवादी नही थे बल्कि बिरादरी वादी थे।

डॉ. अम्बेडकर को आज बहुत बड़ा राष्ट्रवादी कहा जाता है किन्तु वे राष्ट्र से ज्यादा महत्त्व अपनी बिरादरी को देते थे। उन्होने स्पष्ट कहा था कि - अगर कभी भी देश और उनकी बिरादरी के लोगो के हितो में टकराव होता है तो वे देश के साथ नही, सिर्फ और सिर्फ अपनी बिरादरी के साथ है। 
इस सम्बन्ध में दो पुस्तकों के स्क्रीन शांट प्रमाण में दिये जाते हैं - 
पहली पुस्तक Dalit freedom fighters है जिसके लेखक Mohan Das Namishray है।
दूसरी पुस्तक dr ambedkar and untouchability analysing and fighting caste है जिसके लेखक  Professor Jaffrelot है। 

अतः डॉ. अम्बेडकर ने राष्ट्र के लिए न करके, जो किया वह अपनी बिरादरी के लिए किया था। उनकी पार्टी का नाम भी था - श्ड्यूलड कास्ट फेडरेशन। इसलिए वे राष्ट्रवादी न थे बल्कि बिरादरीवादी थे। उन्हें राष्ट्रभक्त या राष्ट्र की उन्नति का मसीहा न कहकर बिरादरी भक्त या बिरादरी का मसीहा कहना उचित है।
साभार - प्रीतम कुमार 
https://mbasic.facebook.com/groups/1900704786813998?view=permalink&id=2091005211117287&refid=18&__tn__=%2As-R

क्या उपनिषद वेद के विरोधी हैं? (डॉ. अम्बेड़कर भ्रमभंजन भाग 3)

पिछले लेखों में हमने डॉ. अम्बेड़कर की उपनिषदों और वेदों के सम्बन्ध में भ्रान्तियों का निवारण किया था। उन्ही के उसी अध्याय पर आगे बढ़ते हैं, जहां उन्होने लिखा है -
 डॉ. अम्बेड़कर ने यहां अनुलोम और प्रतिलोम का प्रकरण छेड़ कर ये सिद्ध करने की कोशिस की है कि उपनिषद और वेद आपस में प्रतिद्वन्दी थे। अब पता नही उनकी कैसी बुद्धि थी कि जहां जो बात है ही नही उसे भी वे देख लेते थे। भला अनुलोम और प्रतिलोम से कैसे दोनों में विरोधता हो जाएगी? विरोधता तो तब होती जब वेद में या उपनिषद में इन दोनों में से किसी के विरोध में दिखता। न तो वेदों ने यह कहा कि ब्राह्मण क्षत्रिय से ब्रह्मविद्या की शिक्षा ले, न उपनिषदों ने। मनुस्मृति आदि वेदोक्त स्मृतियों के अनुसार ब्राह्मण का कर्म विद्या देना है किन्तु यहां इस उपनिषद के प्रकरण में गार्ग्य ब्रह्मविद्या की प्राप्ति के लिए अजातशत्रु के पास जाते हैं। स्मृतियों के नियमानुसार ही अजातशत्रु ने ऐसा कहा था - स होवाचाजातशत्रुः प्रतिलोम चैतद्यद् ब्राह्मणः क्षत्रियमुपेयाद् ब्रह्म मे वक्ष्यतीति 2.1.15 अर्थात् ये प्रतिलोम है कि ब्राह्मण क्षत्रिय से ब्रह्म के विषय में पूछे। अतः यहां वेद का विरोध या वेद विहित स्मृतियों का विरोध नही है बल्कि समर्थन ही है कि ब्रह्म अधीयते ब्राह्मण से ब्राह्मण को ब्रह्म विद्या में सभी वर्णों से अधिक दक्ष होना चाहिये। जब गार्ग्य ने विनम्रता पूर्वक अजातशत्रु से उपदेश देने को कहा तब उन्होने उसे उपदेश दिये। अतः यहां उपनिषद और वेद की प्रतिस्पर्द्धा देखना अम्बेड़कर साहब की बालबुद्धि ही है। 

आगे उन्होने बौधायन धर्मसूत्र के श्राद्ध प्रकरण की बात की है। प्रथम तो यहां हम श्राद्ध की वैदिकता और अवैदिकता की बात न करते हुए सीधा धर्मसूत्र की बात पर विचार करते हैं। इस प्रकरण में भोजन के लिए प्राथमिकता कर्मकांडी ब्राह्मणों को दी गई है अर्थात् जो स्मार्त है तथा गृहस्थ रहकर कर्मकांड़ करते हैं फिर उनके अभाव में उन ब्राह्मणों को जो उपनिषदों के अनुसार वैराग्यवान हो कर सन्यासी होकर कर्मकांडों, शिखा, यज्ञोपवीत से विरक्त होकर मात्र ब्रह्म का ध्यान, चिन्तन करते हैं। इसका कारण यह है कि स्मार्त कर्मों में मुख्यतः गृहस्थ को ही अधिकारी माना है तथा गृहस्थ ही त्रि ऋण को उतारने का पालन करता है, इसलिए उनके कर्मकांड़ करवाने तथा गृहस्थों के यज्ञों में भोजन के अधिकारी प्रथम गृहस्थ जनेऊ और शिखाधारी कर्माकांडी ब्राह्मण माने गए है। सन्यासी इन त्रि ऋणों से मुक्त होता है तथा अपना यज्ञोपवीत और शिखा का त्याग कर देता है। वह स्मार्त और श्रौताग्नि से भी मुक्त हो जाता है अर्थात् कर्मकांड़ नही करता है इसलिए उसका भोज्य भिक्षाटन ही होता है इसलिए ऐसे ब्रह्मविद्य ब्राह्मण अर्थात् सन्यासी को कर्मकांडी ब्राह्मण के अभाव में ही बुलाने का नियम किया है। इसी धर्मसूत्र में भी उपनिषदों अनुसार ब्रह्मविद्या प्राप्ति के कुछ उपायों का वर्णन है जैसे - ओम का जाप, ब्रह्म की उपासना, प्राणायाण, गायत्री जप आदि। अतः किसी प्रकरण विशेष में कर्मों और नियमों के आधार पर किसी को प्राथमिकता देना प्रतिद्वन्दता नही है। जैसे - मान लीजिये कोई शिक्षक सभा है और वहां केवल हिन्दी भाषा के ही अध्यापकों को सम्मानित करना है तो इसका अर्थ यह नही होता कि वहां भौत्तिक या गणित के शिक्षकों को नीचा समझा जा रहा है। 
अतः उपनिषदों और वेदों में कोई प्रतिस्पर्द्धा नही थी। उपनिषद वेदों में ब्रह्म प्राप्ति के क्रियात्मक साधनों की ओर अधिक बल देते हैं। वे वेदों को शब्द मात्र रटने के पक्ष में न होकर वेदों को जीवन में धारण करने के पक्षधर है।
संदर्भित ग्रंथ एवं पुस्तकें -
1) हिन्दू धर्म की पहेली - डॉ. अम्बेडकर
2) बौधायन धर्मसूत्र - भारतीय विद्या प्रकाशन