Monday, November 12, 2018

क्या विक्रम संवत प्रवर्तक राजा विक्रमादित्य काल्पनिक है?

कई लोग भर्तृहरि के भाई, विक्रमसंवत प्रवर्तक राजा विक्रमादित्य को काल्पनिक मानते है। कुछ लोग इन्हे गुप्तवंश कालीन चन्द्रगुप्त द्वितीय बताते है किन्तु ईसा के 57 वर्ष पूर्व संवत प्रवर्तक विक्रमादित्य का अस्तित्व अवश्य था। इन्ही के राज्य में वराहमिहिर, वैतालभट, कालिदास, वररुचि जैसे नवरत्न थे। इन नवरत्नों के ग्रंथ आज भी विद्यमान है। विक्रम संवत के प्रवर्तक विक्रमादित्य के पुरात्त्व साक्ष्य भी आज प्राप्त हो चुके है। जिन्हे महाराजा विक्रमादित्य शोध संस्थान उज्जैन ने प्रकाशित किया था। इन साक्ष्यों के कुछ अंश हम इस पोस्ट के द्वारा प्रस्तुत कर रहे है, जिससे सिद्ध हो जाएगा कि राजा विक्रमादित्य एक वास्तविक राजा थे।
विक्रमादित्य के शिलालेख - 
मंदसौर से 18 किलोमीटर की दूरी पर अँवलेश्वर नामक स्थान पर एक स्तम्भ पर दाहिने और बाहिनी तरफ ईसा पूर्व लगभग प्रथम शताब्दी की ब्राह्मी लिपि में संस्कृत भाषा में शिलालेख मिला है - 
इस शिलालेख में विक्रमादित्य और उनके द्वारा जलाशय बनवाने का उल्लेख है। 
इस शिलालेख में पुग द्वारा दान, दशपुर आदि नाम अंकित है। 

इन शिलालेखों से विक्रमादित्य का प्रमाण पुष्ट होता है। 
अब कुछ सिक्के और शील प्रदर्शित करते हैं - 
इस सिक्के के पुरो भाग में गतिशील अश्व और पृष्ठ भाग में उजयिनि विक्रम लिखा है। 
इस सिक्के के पुरोभाग में शिव है तथा दाहिनि तरफ ब्राह्मी में राजा विक्रम अंकित है। शिव होने से सम्भवतः भगवान शिव के किसी उत्सव के आयोजन पर ये मुद्रा प्रकाशित की होगी। 


 
ये कुछ अन्य सिक्के है जिन पर कतस अर्थात् कृतस्य लिखा है जो कि कृत संवंत प्रवर्तक के रुप में विक्रमादित्य को प्रदर्शित करते हैं। 


इन चित्रों में प्रथम गढकालिका से प्राप्त मुद्रा है जिस पर मध्य में स्वस्तिक और ऊपर ब्राह्मी में सिरि कतस उजेयनि लिखा है। दूसरा चित्र वाकणकर शोध संस्थान में स्थित एक शील का है जिस पर कुतस अर्थात् कृतस्य अंकित है। 
इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि उज्जैयनी नरेश विक्रमादित्य एक वास्तविक राजा थे। एक अन्य स्पष्टीकरण भी देते है - 
वराहमिहिर जिन्हे राजा विक्रमादित्य (विक्रम संवत के प्रवर्तक जो कि ईसा से 57 वर्ष पूर्व का है) का नवरत्न कहा जाता है। 
धन्वन्तरिः क्षपणकोऽमरसिंहः शंकूवेताळभट्टघटकर्परकालिदासाः।
ख्यातो वराहमिहिरो नृपतेस्सभायां रत्नानि वै वररुचिर्नव विक्रमस्य॥
उनका काल 505 ईसा बाद माना है। अब ये कैसे सम्भव है कि विक्रमादित्य के नवरत्न हो कर भी वराहमिहिर का काल ईसा बाद हो जाता है? अतः यहां कुछ न कुछ गडबड अवश्य है। वराहमिहिर द्वारा वृहत्संहिता नामक एक ग्रंथ लिखा गया है। इसके व्याख्याकार भट्टोत्पल हुए है उन्होने वराहमिहिर की पंचसिद्धान्तिका के एक श्लोक 3.59 के आधार पर वराहमिहिर के काल में सूर्य की जो स्थिति उत्तरायण और दक्षिणायन नक्षत्र के अंशों में बताई है । उसके अनुसार अयनगति की गणना से यह परिणाम आता है कि अब से लगभग 1998 वर्ष पूर्व अर्थात् लगभग 20 ईसा बाद वराहमिहिर का अस्तित्व था। इस गणना से वराहमिहिर का विक्रमादित्य के नवरत्नों से भी सामंजस्य होे जाता है।

अतः जहाँ वामपंथी इतिहासकारों ने राजा विक्रमादित्य को काल्पनिक कहा है वही आनन फानन में गलत निष्कर्ष प्रस्तुत करके उनके नवरत्नों को ईसा बाद का बताया है। ऐसे इतिहासकार जो प्रत्येक सनातन धर्मी चरित्र को काल्पनिक कह देते है, उनसे सावधान रहना आवश्यक है। 

संदर्भित ग्रंथ एवं पुस्तकें -                                                                        
1) पुरातत्त्व में विक्रमादित्य - डां भगवतीलाल राज पुरोहित व जगन्नाथ दुबे
2) वेदान्त दर्शन का इतिहास - उदयवीर शास्त्री जी

Sunday, November 11, 2018

क्या कृष्ण का चरित्र ईसा बाद में कल्पित किया गया?

कई अम्बेडकरवादी आक्षेप करते है कि कृष्ण का चरित्र ईसा के बाद कल्पित किया गया था। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि कृष्ण और महाभारत का निर्माण बौद्ध, यूनानी कथाओं के मिश्रण से ईसा के बहुत बाद में हुआ, कुछ इस काल को गुप्तकाल में ले जाते है। किन्तु जैसे लोग पहले इलियाड में लिखी हुई बातों को काल्पनिक बताते थे और टाँय नगर को होमर की कल्पना मानते थे लेकिन टाँय नगर की खोज के बाद होमर के वृतान्त को सत्य माना गया। इसी प्रकार से द्वारिका, लाक्षागृह के समीप रथ, हस्तिनापुर की खुदाई में प्राचीन सभ्यता मिलने से महाभारत की वास्तविकता और कृष्ण जी का ईसा पूर्व अस्तित्व सिद्ध हो जाता है। 
अब हम कुछ प्रमाण देते है जिनके अनुसार कृष्ण का अस्तित्व ईसा पूर्व सिद्ध हो जाता है। 
बेसनगर में एक गरुडस्तम्भ अभिलेख प्राप्त हुआ है। जिसके अनुसार कृष्ण जी के लिए गरुड स्तम्भ का निर्माण लगभग 200 ईसा पूर्व हो गया था। 
देवदेवस वासुदेव गरुडध्वजे अयं
कारिते इ हेलिओदोरेण भाग
वतेन दियस पुत्रेण तखसिलाकेन
योन दूतेन गतेन महाराजस
अन्तलिकितस उपन्ता सकासं रञो 
कासी पुत्र स भागभद्रस त्रातारस
वसेन च तु दसेन राजेन बधमानस। 
- बेसनगर से प्राप्त गरुडध्वज अभिलेख (काल - लगभग - 200 ई.पू.) 
यह शिलालेख कृष्ण जी की पूजा का प्रचलन और कृष्ण के अस्तित्व को 200 ईसा पूर्व सिद्ध करता है। 
दूसरा शिलालेख हाथीबाडा से है। जिसमें कृष्ण और बलराम दोनो का उल्लेख है। 
वतेन राजायनेन पराशरीपुत्रेण स 
र्वतातेन अश्वमेध या जिना भागवद्भ्याम् संकर्षण वासुदेवाभ्याँ 
अनिहताभ्याँ सर्वेश्वराभ्याँ पूजा शिला प्रकारो नारायण वाटिका।
- हाथीबाडा अभिलेख, 100 ईसा पूर्व
इस शिलालेख में वासुदेव और बलराम के लिये पूजा शिला की स्थापना का उल्लेख किया है। अतः कृष्ण पूजा ईसा पूर्व प्रचलित हो चुकी थी। 
तीसरा और चौथा शिलालेख नाणेघाट का शिलालेख है जिससे ईसापूर्व न केवल कृष्ण की अपितु महाभारत के भी अस्तित्व में वर्तमान रहने का प्रमाण मिल जाता है। 
ओम् नमो प्रजापति नो धंमस नमो ईदस नो संकंसन वासुदेवान चंद सूरान महिमावतानं ....
- अज्ञात रानी का शिलालेख, नाणेघाट, लगभग 200 ईसा पूर्व
पुरवस कुल पुरिस .... राम - केसवाजुन- भीमसेन - तुल - परकमस ......... नभागा - नहुस - जनमजेय - सकर .... 
- वाशिष्ठीपुत्र श्री पुलुमावि का शिलालेख. लगभग 200 - 100 ईसा पूर्व के मध्य)
ये दोनो शिलालेख सातवाहन कालीन राजाओं के समय के है। इनमें महाभारत में वर्णित राजाओं के नाम - नहुस, जनमजेय, नभागा का उल्लेख है। 

ये शिलालेख का प्रमाण कृष्ण की वर्तमानता को ईसा पूर्व सिद्ध करते है। अब कुछ अन्य प्रमाण उपस्थित करते है - 
ये प्रमाण कृष्ण और बलराम की मुर्ति निर्माण को ईसा पूर्व सिद्ध करते है। 
इसी प्रकार मथुरा में कृष्ण की मुर्ति का निर्माण शोडाष के काल में 80 ई.पू. हुआ था। 

इन प्रमाणों से उन लोगों की कुधारणाओं का खंडन हो जाता है, जो कृष्ण के अस्तित्व को ईसा के बाद और गुप्तकाल का बताते हैं। 

संदर्भित ग्रंथ एवं पुस्तकें - 
1) प्राचीन भारत के प्रमुख अभिलेख - डाँ परमेश्वरीलाल गुप्ता
2) मथुरा - श्री कृष्णदत्त वाजपेयी ( संग्रहाध्यक्ष पुरातत्त्व संग्रहालय मथुरा)
3) पुरातत्व साहित्य कला - एक दृष्टि. - लेखक डाँ. भगवतशरण उपाध्याय

Thursday, October 4, 2018

लड़कियों का शराब पीना पुरुषों के शराब पीने की अपेक्षा अधिक हानिकारक है।


आजकल के नवीन नारीवादी (वास्तव में नारियों के अहितकर) नारियों द्वारा शराब पीने का इसलिए समर्थन करते हैं कि जब पुरुष शराब पी सकते हैं, तब नारियाँ क्यों नही? नारियों को यह समानता का अधिकार दिलाने का ये नारीवादी संगठन भरसक प्रयास करते हैं। यदि ये संगठन इस बात को कहते कि पुरुषों से भी शराब की आदत छूटे तो हम इन सबके पक्ष में अवश्य होते किन्तु ये लोग इसके विपरीत इस गलत और हानिकारक आदत को महिलाओं में भी लाना चाहते हैं।

वस्तुतः शराब पीना पुरुष और महिला दोनों के लिए हानिकारक है, किन्तु महिलाओं का शराब पीना समाज में बहुत ही बूरा समझा जाता है और उतना बूरा समझा जाता है कि जितना एक पुरुष का शराब पीना नही समझा जाता है। हालांकि पुरुषों का भी शराब पीना अत्यन्त गलत है किन्तु महिलाओं का शराब पीना तो इतना गलत है कि इसके लिए अतिवाद को प्रयोग करने वाला कोई शब्द ही शेष नही बचता है। इसके पीछे हम सामाजिक, सांस्कृतिक कारण प्रस्तुत न करते हुए वैज्ञानिक कारण प्रस्तुत कर रहे हैं, क्योंकि आधुनिक नारीवादियों के लिए संस्कृति और धर्म का विशेष महत्त्व न हो किन्तु वैज्ञानिकता का महत्त्व अवश्य ही होगा ऐसी आशा करते हैं।

पुरुषों से विशेष नारियों में ये विशेषता है कि नारियाँ ही अपने गर्भ में शिशु का पालन करती है। शिशु की सृष्टि नारी पर ही निर्भर होती है इसलिए वेद भी नारी को ब्रह्मा कहते हैं। अतः जब कोई स्त्री शराब पीती है तो उसका हानिकारक प्रभाव न केवल उस स्त्री पर अपितु उसकी सन्तान पर भी पड़ता है तथा सन्तान से ये प्रभाव पीढीं दर पीढीं अगली सन्तानों पर भी होता है। जो नारियाँ शराब का सेवन करती है उनकी सन्तानों में एक विशेष प्रकार का रोग होजाता है जिसे fetal alcohol syndrome अर्थात् FAS कहते हैं। इसके कारण गर्भस्थ शिशु में अनेकों शारीरिक और मानसिक रोग उत्पन्न होते हैं। जैसे - शरीर के आकार में कमी, स्मरण शक्ति में कमी, हड्डियों का कमजोर होना, किडनी की समस्याऐं आदि।
इस सिंड्रोम के विषय में अधिक जानकारी निम्न लिंक से प्राप्त करें -
https://kidshealth.org/en/parents/fas.html

इसी कारण महिलाओं का शराब पीना पुरुषों के शराब पीने से अधिक हानिकारक है और इसका समाज और भावी पीढी पर अत्यन्त ही हानिकारक दुष्प्रभाव होता है। अतः आशा है कि नवीन नारीवादी इस वैज्ञानिक तथ्य को देखते हुए, आगे से कभी भी किसी भी प्रकार से महिलाओं के शराब पीने का समर्थन नही करेंगे, साथ ही पुरुषों को भी शराब का त्याग करने का संदेश देंगे। इसके बाद भी यदि कोई महिलाओं के शराब पीने का इसलिए समर्थन करे कि पुरुष भी शराब पीते है तो समझिये ऐसा दुराचारी व्यक्ति देश की संस्कृति को मलीन करने के साथ - साथ महिला के गौरव को भी नष्ट करना चाहता है और वह इस समाज का सबसे बड़ा शत्रु है। 

Thursday, September 20, 2018

कम्युनिस्ट पार्टी का पाकिस्तान प्रेम



कम्युनिस्ट पार्टी ने 2014 में अपना एक घोषणा पत्र प्रकाशित किया था। जिसका हिन्दी अनुवाद "हिन्दूस्तान की कम्युनिस्ट गदर पार्टी" द्नारा किया गया था। इसमें अपनी विदेश नीति में जोे लिखा है वो चित्र में देख सकते है। यहां इन्होने ये तो लिख दिया कि पाकिस्तान पर अमेरिका के हमले रोकना किन्तु जो पाकिस्तान भारत की सीमा उल्लंघन करता है और भारतीय सैनिकों के सिर काट कर ले जाता है, उसके विरूद्ध क्या कार्यवाही हो?, इस बारे में कुछ भी इन्होने अपने घोषणा पत्र में नही लिखा है। इसी से इनका पाकिस्तान प्रेम झलक जाता है तथा इसीलिए कम्यूनिस्ट नेता से अभिनेता तक पाकिस्तान को महान देश और पाकिस्तानियों को शांति रक्षक बताते रहते हैं।
संदर्भित ग्रंथ  एवं पुस्तकें - 
1) घोषणा पत्र 2014 - कम्यूनिस्ट गदर पार्टी भारत

Wednesday, September 19, 2018

डॉ. अम्बेड़कर राष्ट्रवादी नही बल्कि बिरादरी वादी थे। भाग - 3



इस देश की आजादी का अगर कोई सबसे अधिक खिलाफ था तो शायद वो थे डा भीम राव अम्बेडकर।
14 मई 1946 को अम्बेडकर साहब ने इस बाबत अंग्रेजी राज के प्रति अपनी, अपनी जाति कौम की बफादारी को व्यक्त करते हुये ए वी एलेक्जेडर ( A V Alexander) मेंम्बर ऑफ ब्रिटिश केबेनट मिशन , को पत्र भी लिखा था।
गूगल कर सकते इस पत्र को । मिल जायेगा।
इस पत्र मे अम्बेडकर साहब ने लिखा ये देश अगर अंग्रेजो का गुलाम बन सका तो सिर्फ उनकी कौम के लोगो की वजह से। उन्होने लिखा कि किस तरह उनकी बिरादरी ने इस देश को गुलाम बनवाने मे योगदान दिया और गुलाम बनाये रखने मे हमेशा अंग्रेजो का साथ दिया।
जो इन्सान देश को आजाद ही नही देखना चाहता हो उसे उस देश के संविधान की ड्राफ्टिंग कमेटी का अध्यक्ष कैसे बनाया जा सकता है ? संविधान सभा 1946 मे ही बनी थी केबिनेट मिशन की देख रेख मे।

इससे स्पष्ट है कि अम्बेड़कर राष्ट्रवादी नही थे अपितु वे बिरादरी वादी थे। अपनी जाति के लाभ के लिए वे देश को गुलाम रखने के भी पक्षधर थे। उन्हे राष्ट्र प्रेमी बताना सबसे बड़ी मूर्खता है। 
उससे भी बड़ी मूर्खता यह है कि देश के साथ गद्दारी करने वालो को इनाम मे योजनाये और फेवर मे कानून का प्रावधान धरती पर सिर्फ इसी देश मे है।

साभार - प्रितम कुमार

Friday, September 14, 2018

अशोक स्तम्भ नाम से प्रसिद्ध सभी स्तम्भ अशोक के बनवाये तथा अशोक कालीन नही है।

अम्बेड़करवादी अशोक स्तम्भों को बहुत प्रमुखता देते है और उसे बौद्ध मत की उन्नत शिल्प कला के रूप में भी प्रस्तुत करते हैं। इसी के साथ - साथ वे हिन्दूओं पर आक्षेप भी करते हैं कि हिन्दूओं ने बौद्ध मंदिरो और विहारों को कब्जे में करके उसका हिन्दू रुपान्तरण किया है। हालाकि अपनी बात की सिद्धि में वे कोई प्रमाण नही दे सके है किन्तु हम यहां इस बात का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं कि अशोक के नाम से प्रसिद्ध अनेकों स्तम्भ अशोक से पूर्वकालीन है। जिसपर अशोक ने अपनी लिपि खुदवाई थी। इसका विवरण स्वयं अशोक ही ने किया है। दिल्ली टोपरा के शिलालेख में आया है -
धम्मलिबि अत अथि सिला - थम्भानि वा सिला फलकानि वा तत कटविया एन एस चिलठितिके सिया।
  - पंक्ति 22
अर्थात् यह धम्मलिपि, जहाँ शिलास्तम्भ वा शिलाफलक हैं वहाँ खुदवायी जाय, जिससे यह चिरस्थित हो।
इस पंक्ति से यह स्पष्ट होता है कि अशोक ने कई शिला स्तम्भ स्वयं नही बनवाये थे बल्कि उससे पूर्व जो स्मम्भ थे उन पर अपनी लिपि अंकित करवाई थी।

कई इतिहासकारों का ये मानना है कि अशोक के पूर्वकालीन ये स्तम्भ महाभारत कालीन वैदिक याग के पशुयूप या ध्वज स्तम्भ है। इस विषय में दो पुस्तकों के प्रमाण देते है -

इनमें पहला प्रमाण नीलकंठ शास्त्री की पुस्तक नंद और मौर्यकालीन भारत से है तथा दूसरा प्रमाण भारतीय मुर्तिशिल्प एवं स्थापत्य कला से है।

अतः सम्भवतः अशोक ने कई वैदिक स्तम्भो को अपने कब्जे में लेकर उन पर अपनी लिपि खुदवा कर उनका बौद्ध रुपान्तरण किया हो?

साभार - सचिन गिरि गोस्वामी (दूसरी पुस्तक के चित्र उपलब्ध करवाने हैतु)
संदर्भित ग्रंथ एवं पुस्तकें -
1) नन्द एवं मौर्यकालीन भारत - नीलकंठ शास्त्री
2) भारतीय मूर्तिशिल्प एवं स्थापत्य कला - मीनाक्षी कासलीवाल
3) प्राचीन भारत के प्रमुख अभिलेख - डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त

बौद्ध धम्म में श्राद्ध और पिंड दान (डॉ. अम्बेडकर की प्रतिज्ञा का खंडन)


डॉ. अम्बेड़कर ने 22 प्रतिज्ञाओं में से एक प्रतिज्ञा में लिखा है -
मैं श्रद्धा (श्राद्ध) में भाग नहीं लूँगा और न ही पिंड-दान दूँगा. 
लेकिन बौद्ध धम्म में पिंड़ दान न करने वाले को अधार्मिक माना गया है। इस बात का प्रमाण मैं किसी ग्रंथ से न देकर बौद्ध राजा के शिलालेख से ही देता हूँ। 
शिनकोट से एक मंजूषा पर प्राकृत भाषा में ब्राह्मी लिपि में लिखा हुआ शिलालेख प्राप्त हुआ है। मिलिन्द्र के बाद विजयमित्र नामक कोई बौद्ध राजा हुआ उसने बुद्ध के अस्थि अवशेष के टूटे हुए पात्र के स्थान पर नया पात्र स्थापित किया था और इसकी जगह पर एक लेख लिखवाया था जिसमें कुछ पंक्तियाँ है - 
"स शरिअत्र कलद्रे नो शध्रों न पिंडोयकेयि पित्रि ग्रिणयत्रि।"
प्रत्रिथवित्रे विजयमित्रेन अप्रचरजेन भग्रवतु शकिमुणिस समसंबुधस शरिर। 
इसका अर्थ है - उस काल में कोई ऐसा व्यक्ति नही था जो श्रद्धालु हो और पित्रगणों को पिण्ड और उदक दे सके। 
तब अप्रचराज विजयमित्र ने भगवान शाक्यमुनि के सम्यक् शरीर को प्रतिष्ठापित किया और इस पात्र को स्थापित किया। 
इससे स्पष्ट है कि भीमराव अम्बेड़कर ने एक बौद्ध मान्यता को ही नकारा है और यदि पिण्डदान पाखंड है तो ये प्राचीनकाल में बौद्ध मत में भी प्रचलित था अतः पाखंडी ब्राह्मण ही नही अपितु बौद्ध भी थे।
संदर्भ ग्रंथ एवं पुस्तके - 
1) प्राचीन भारत के प्रमुख अभिलेख - परमेश्वरीलाल गुप्त